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जीवन विचार मंच( प्रथम भाग)

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  पवित्रता की बात!...   मित्रों जब भी कभी चार मित्र आपस में बैठकर कुछ चर्चा करते हैं या किसी धर्म सभा में किसी विषय पर चर्चा शुरू होती है कि कौन महात्मा है? कौन ढोंगी है? किस महिला का चरित्र अच्छा है? कौन दुशचरित्र है? कौन पतिव्रता है? कौन चोर है?कौन साधु है? उस ज्ञान चर्चा में, हम सभी अपना सुंदर पक्ष तो सबके सामने रखते हैं! अपनी दान और वीरता की कहानियां सबको सुना देते हैं और  अंधेरे में की गई गलतियों को हम सभी छुपा कर रखते हैं! यदि हमने उन गलतियों से कुछ सबक लेकर कुछ सीख कर और प्रायश्चित करके उन्हें छोड़ दिया है! तो बहुत अच्छी बात है! और हमारी समझदारी है! लेकिन कुछ के लिए तो यह गलतियां गलतियां ही नहीं होती! बल्कि उनके आगे बढ़ने का, प्रसिद्धि पाने का मार्ग होती हैं! अपने इस लेख में हम पवित्रता और  अपवित्रता के इसी विषय पर चर्चा करेंगे।                 एक छोटी सी कहानी… मित्रों वर्षों पुरानी बात है! उस समय मेरी एक छोटी सी कॉमिक्स, उपन्यास,  पत्र पत्रिकाएं आदि किराए पर देने की, किताबों की...

जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( सातवां भाग)

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  स्वयं को समझना… मित्रों हम इस दुनिया में रहते हैं,  हमारा एक नाम है, हमारी एक पहचान है, हमारा एक परिवार भी है, हम जानते हैं कि यह हमारे माता-पिता हैं,  यह हमारे भाई बहन हैं, हम इस नगर, इस देश या इस कस्बे में रहते हैं, जिनका कोई ना कोई नाम भी अवश्य है। मित्रों हमारा जो नाम है, जो हमारे माता-पिता ने रखा है! उस नाम के पुकारने पर हमें लगता है कि हमें किसी ने बुलाया! वह नाम कोई दूसरा भी हो सकता था और हम उसे बदल भी सकते हैं! क्या हमारा जो नाम है, हम वही हैं? नाम तो इस भौतिक शरीर की पहचान है, लेकिन जो इसके भीतर चैतन्य तत्व बोल रहा है, समझ रहा है, इस शरीर के द्वारा, समस्त कार्य करवा रहा है वह तत्व कौन सा है? वह तत्व क्या है? यानी कि हम विचार करने के लिए  कह सकते हैं, कि मैं कौन हूं? इसी ज्ञान को गहराई से समझने पर, इसे ऋषि मुनियों द्वारा आत्मज्ञान का नाम दिया गया है! हमें इसी आत्मा के ज्ञान को समझना है! यही सच्चे सुख का ज्ञान है।                  एक दिव्य कथा… मित्रों! एक समय महर्षि वशिष्ठ जी और भगवा...

जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( छठा भाग)

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  सच्चे सुख की तलाश… थोड़ी फुर्सत सी हुई है तब मन में विचार आ रहा है कि मुझे सबसे अच्छा क्या लगता है मुझे किसकी चाहना हर पल रहती है मित्रों हम कुछ भी करते हैं हम चाहते हैं कि हमें उससे सुख मिले खाने में पीने में चाय में नाश्ता करने में  बात करने में स्पर्श करने में हंसी मजाक करते हुए हमें सुख मिलता रहता है यानी हमें हर पल यही चाह रहती है  कि मुझे सुख निरंतर मिलता रहे!  शरीर में कहीं भी जरा सी भी चोट लग जाए और दर्द हो जाता है, यदि सिर में दर्द हो जाए तो हम परेशान हो जाते हैं दर्द को तो हम तुरंत ही हटाना चाहते हैं। हमारे दांत में हमारे सिर में या चोट लगने से हड्डी में हुआ दर्द उससे हम अत्यंत परेशान हो जाते हैं हमारा पूरा ध्यान उसी को हटाने में लग जाता है किसी प्रकार यह खत्म हो क्योंकि इसके रहते तो जीवन में अन्य कार्य संभव ही नहीं हो पाता हल्का दर्द हो तो चल जाता है यदि तेज हो  जाए  तो उसके हटने से पहले हम कुछ भी नहीं सोच पाते नींद भी नहीं आती लेकिन दोस्तों यह यह दुख जो है हमें तनिक भी अच्छा नहीं लगता लेकिन बड़े आश्चर्य की बात है कि हमें सुख का पता भी तभी लगत...

जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( पांचवा भाग)

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  हमारी दिनचर्या… सवेरा हो गया है! जीवन का सफर शुरू हो गया है! हम अपने नित्य प्रति के कार्यों में लग गए हैं! थोड़ी मॉर्निंग वॉक, स्नान, ध्यान आदि  होने के पश्चात अब नाश्ता कर रहे हैं, फिर नौकरी पर जाना है और शाम को घर आएंगे कुछ खा पी कर रात्रि में सो जाएंगे! फिर सवेरा और फिर वही शाम और रात्रि को आराम! ऐसा हम नित्य प्रति करते हैं क्योंकि यही तो हमारी दिनचर्या है! नित्य प्रति हम आराम करते हैं लेकिन क्या वास्तव में हमें आराम मिल पाता है? कुछ मिलता तो है! जब हम गहरी नींद में होते हैं! और जागकर हमें बहुत ताजगी महसूस होती है। सपनों की दुनिया में भी नित्य ही जाना होता है, जिससे सपने तो हम रोज ही देखते हैं, उसके बाद नींद में चले जाते हैं। सपनों की यह दुनिया,बस थोड़े समय के लिए ही होती है, अल्पकालिक! जैसी दुनिया  हम जागृत में देखते हैं, कुछ-कुछ वैसी ही होती है। कभी कोई सुखद सपना देख रहे होते हैं, और वह अचानक टूट जाए तो हम कहते हैं, अरे भाई कितना अच्छा सपना आ रहा था, टूट गया! थोड़ी देर और चलता तो बड़ा मजा आता और अच्छा लगता। रात के सपने की दुनिया, 60 मिनट, 100 मिनट, या 120 मिनट या ...

जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( चौथा भाग)

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                जीवन का रहस्यमय सफर… मित्रों जीवन एक सफर है! और हम इस संसार रूपी गाड़ी में सफर कर रहे हैं! गाड़ी चली जा रही है, सदैव से चलती जा रही है! और हम सब इसमें बैठे-बैठे सफर कर रहे  हैं!मित्रों आपने यह मशहूर फिल्मी गाना तो सुना ही होगा," जिंदगी का सफर" है ये  कैसा सफर! कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं! करते हैं, सब सफर! मगर, कोई समझा नहीं  कोई जाना नहीं! है ये कैसी डगर! चलते हैं, सब मगर! कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं!  बहुत गहरा सच है! इन गीत की पंक्तियों में! मित्रों हम सभी अपने अपने जीवन का सफर  कर रहे हैं! लेकिन क्या हम इस जीवन के सफर के बारे में अच्छी तरह जानते  हैं? कि  हमारा यह  सफर है क्या? और हमारे इस सफर की यह गाड़ी आखिर जाती कहां है? कौन से मुकाम पर इसे पहुंचना है? बहुत ही गहरा और जरूरी प्रश्न है? जिसे हमें जानना और समझना बहुत जरूरी है। इस लेख में हम इन सब बातों पर विचार करेंगे।                ...

जीवन की ज्ञान यात्रा( तीसरा भाग)

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               ज्ञानी पुरुष की पहचान … एक प्रश्न अक्सर हमारे सामने आता ही रहता है कि ज्ञानी कौन है? हम किसे ज्ञानी कहें? क्या उसकी कोई वेशभूषा है? जिससे हम उसे पहचान कर  उसे ज्ञानी कहेंगे! क्या गृहस्थ में रहने वाला पुरुष ज्ञानी नहीं हो सकता? या ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता? दोस्तों सभी के विचारों में कुछ भिन्नता हो सकती है! परंतु एक बात तो सत्य है, कि ज्ञानी का अर्थ है, ज्ञान को धारण करने वाला! ज्ञान को समझने वाला! चाहे फिर वह  किसी भी  क्षेत्र में  है! चाहे वह गृहस्थी  है! या  कोई सन्यासी या कोई साधु या कोई किसान या सरकारी ऑफिसर या  कोई मंत्री  या प्रधानमंत्री कोई भी हो सकता है। ज्ञानी कोई पीले कपड़े पहनने से नहीं होता, ना ही ज्ञानी कोई विशेष टोपी लगाने से होता है! और ना ही  कोई विशेष अच्छा सा नाम रखने से होता है! जैसे कि योग सम्राट श्री श्री जी महाराज! ऐसे नाम रखने मात्र से कोई ज्ञानी या योग सम्राट नहीं हो जाता! ज्ञानी का मतलब है कि उसमें आध्यात्मिक समझ का विकसित होना! फिर वह अपनी जी...

जीवन की ज्ञान यात्रा( दूसरा भाग)

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                ज्ञान मार्ग या कर्म मार्ग दोनों में  से श्रेष्ठ कौन सा है? या फिर दोनों को मिलाकर  ही रास्ता बनता है! यह एक गहन प्रश्न है? हमारे महान ऋषि-मुनियों ने,  जैसे  महर्षि श्री अगस्त जी, महर्षि श्री वशिष्ठ जी, इन सभी ने हमें समझाया है कि हमारा वास्तविक लक्ष्य है, मोक्ष प्राप्ति! वह न तो केवल कर्म से होता है! और न केवल ज्ञान मात्र से! इन दोनों को  मिलाकर ही हम मोक्ष प्राप्ति कर सकते हैं। जिस  प्रकार से एक पक्षी दोनों पंखों से आकाश में उड़ता है, उसी प्रकार कर्म करने से अंतःकरण शुद्ध होता है और फिर ज्ञान के द्वारा अभ्यास करने से हमें आत्मबोध या ज्ञान प्राप्ति या मोक्ष की प्राप्ति होती है।                   एक प्राचीन कथा …हमारे प्राचीन ग्रंथ योगवाशिष्ठ में एक कथा आती है कि ऋषि श्री अगस्त जी के शिष्य श्री  सुतीक्षण  जी के मन में यह संशय हुआ कि मोक्ष का कारण ज्ञान है! अथवा कर्म या दोनों! तब सुतीक्षण ...