जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( सातवां भाग)
स्वयं को समझना…मित्रों हम इस दुनिया में रहते हैं, हमारा एक नाम है, हमारी एक पहचान है, हमारा एक परिवार भी है, हम जानते हैं कि यह हमारे माता-पिता हैं, यह हमारे भाई बहन हैं, हम इस नगर, इस देश या इस कस्बे में रहते हैं, जिनका कोई ना कोई नाम भी अवश्य है। मित्रों हमारा जो नाम है, जो हमारे माता-पिता ने रखा है! उस नाम के पुकारने पर हमें लगता है कि हमें किसी ने बुलाया! वह नाम कोई दूसरा भी हो सकता था और हम उसे बदल भी सकते हैं! क्या हमारा जो नाम है, हम वही हैं? नाम तो इस भौतिक शरीर की पहचान है, लेकिन जो इसके भीतर चैतन्य तत्व बोल रहा है, समझ रहा है, इस शरीर के द्वारा, समस्त कार्य करवा रहा है वह तत्व कौन सा है? वह तत्व क्या है? यानी कि हम विचार करने के लिए कह सकते हैं, कि मैं कौन हूं? इसी ज्ञान को गहराई से समझने पर, इसे ऋषि मुनियों द्वारा आत्मज्ञान का नाम दिया गया है! हमें इसी आत्मा के ज्ञान को समझना है! यही सच्चे सुख का ज्ञान है।
एक दिव्य कथा…मित्रों! एक समय महर्षि वशिष्ठ जी और भगवान श्री राम जी के बीच ज्ञान वार्ता चल रही थी। श्री राम जी ने पूछा, कि हे पूज्य गुरुदेव हम सच्चा आत्मज्ञान कैसे प्राप्त कर सकते हैं? श्री वशिष्ठ जी ने उत्तर दिया, हे राम! इसके लिए हमें शम और दम का अभ्यास करना चाहिए और ओमकार का जाप करना चाहिए जिससे परम ईश्वर हम पर प्रसन्न होंगे! और एक दूत हमारे पास भेज देंगे, जो कि हमारे हृदय में प्रकट हो जाएगा! फिर वह दूत सदैव हमारे साथ रहेगा और हमारे सभी कार्यों में हमारी सहायता करेगा! जिससे हमारा मन शुद्ध होता जाएगा और इंद्रियां हमारे वश में होती जाएंगी! और हम निष्काम कर्म करने लगेंगे! और धीरे-धीरे हमारा अंतःकरण भी शुद्ध होता जाएगा! और हम आत्मज्ञान को अच्छे से समझ पाएंगे। श्री राम जी ने फिर पूछा हे आदरणीय गुरु जी! वह दूत कौन सा है? जिसे ईश्वर साधक के पास भेजते हैं! श्री वशिष्ठ जी ने उत्तर दिया, हे राम सुनो, उस दूत का नाम है विवेक! और वह हमारे हृदय में ही प्रकट होता है! उस दूत के आने से हम हर प्रकार से सावधान रहते हैं! और इंद्रियां हमें पतन के मार्ग पर नहीं ले जा सकती! क्योंकि विवेक जो हमारे साथ रहता है! और फिर हम शम और दम दोनों का इकट्ठा अभ्यास करते हैं जिससे हमारा मन और इंद्रियों हमारे वश में हो जाती हैं और फिर हम आसानी से आत्मज्ञान का अभ्यास कर सकते हैं। मित्रों आत्मज्ञान और परमसुख को प्राप्त करने का जो ज्ञान है, जिसे इस जीवन का लक्ष्य! मोक्ष नाम से कहा जाता है! कि हमारे जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है! उसे हम एक छोटी सी कहानी के रूपक के द्वारा समझेंगे।
एक अद्भुत और दिव्य देश… मित्रों एक बहुत बड़ा देश है, वह इतना बड़ा है कि यदि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों मिलकर भी, उस देश का आदि मध्य और अंत जानना चाहे तो नहीं जान सकते! बहुत ही विस्तीर्ण है! स्वर्ग लोक, ब्रह्मलोक आदि जितने भी लोक हैं, वह सब नष्ट हो सकते हैं! लेकिन वह देश कभी नष्ट नहीं होता! उस देश में जाने के बाद, समस्त दुख हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं! और परम सुख प्राप्त होता है! जो कभी खत्म होता ही नहीं है! और यह जीव सदा-सदा के लिए परमानंद को प्राप्त होकर अजर और अमर हो जाता है! फिर और कुछ भी पाना शेष नहीं रहता! इसलिए हमें परम प्रयत्न करके भी उस देश को प्राप्त करना चाहिए! लेकिन उस देश में प्रवेश उस देश के दिव्य राजा की प्रसन्नता से ही होता है! जब उस परम राजा की इच्छा होती है कि,यह जीव मुझे प्राप्त करे! तभी वह उसे प्राप्त कर पाता है! उस दिव्य राजा ने, अपने दिव्य देश में, एक दिव्य मंत्री नियुक्त किया है जो कि सदैव अपने अनुचरों सहित, उस देश के महाद्वार पर रहता है! जिस किसी को भी उस देश में जाना होता है तो पहले, उस मंत्री को अपने वश में करना होता है! और उसे हराना होता है! तभी उस देश में प्रवेश हो सकता है! यही उस देश में प्रवेश करने की मुख्य शर्त है! कि पहले उस मंत्री को हराओ फिर उस दिव्य देश में प्रवेश होगा। यद्यपि वह मंत्री महा बलवान है! और ब्रह्मा विष्णु इंद्र आदि समस्त देवताओं के अस्त्र-शस्त्र भी सब उस पर कुंठित हो जाते हैं! लेकिन यदि राजा का मनन व चिंतन किया जाए तो वह मंत्री आसानी से वश में हो जाता है। कुछ लोग उस मंत्री की ही पूजा करते रहते हैं! उस मंत्री के अनेक विचित्र रूप हैं! मंत्री उनसे प्रसन्न होकर उन्हें संसार की सारी सुख सुविधाओं को प्रधान भी कर देता है लेकिन उन सुख-सुविधाओं का वह एक समय निश्चित कर देता है! उसके बाद वे नष्ट हो जाती हैं! और वे जीव फिर से दुखी हो जाते हैं! और फिर उसकी आराधना करते हैं! यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है! लेकिन उन्हें अखंड सुख प्राप्त नहीं होता! वह अखंड सुख तो केवल राजा से मिलने और उस दिव्य देश में प्रवेश के बाद ही मिलता है।
दिव्य देश का रहस्य…अब प्रश्न यह उठता है कि वह दिव्य देश कौन सा है? उस देश का वह मंत्री कौन है? अब इसे भी समझते हैं, मित्रों उस देश का नाम है मोक्ष! जहां समस्त दुख नष्ट हो जाते हैं! और उस देश का राजा है, आत्म भगवान! जो कि सबसे अतीत भी है! और सब जगह भी है! और उसने मंत्री मन को बनाया हुआ है, जब कोई भी उस दिव्य राजा का गहन चिंतन करता है तो वह उसे उस मंत्री यनी मन को हराने की शक्ति प्रदान करता है! और फिर वह मंत्री आसानी से हमारे वश में होने लगता है! इस प्रकार हमें दोनों का ही इकट्ठा अभ्यास करना है! और धीरे-धीरे यह हमारा मन आत्मा के भीतर ही पूर्ण रूप से लग जाता है और उसी में समा जाता है!मित्रों यह मन यनि सांसारिक वासनाएं ही आत्मा के सामने आवरण रूप में हैं! और जब यह वासनाओं का पर्दा, हमारे सामने से हट जाता है! तो हमें अपने आत्मा का अनुभव होने लगता है और हम यह जान जाते हैं कि हम आत्मा तो सदैव से हैं ही! बस ये मन का आवरण हमारे सामने आया हुआ था और अब वह हट गया है तो हम जान पा रहे हैं कि हम परम आनंद सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा ही हैं! यही सत्य आत्मज्ञान का उदय है।
उपसंघार… मित्रों! हम वास्तव में केवल यह भौतिक शरीर नहीं बल्कि एक परम चैतन्य आत्मा हैं! और आत्मा सर्व व्यापक है! जब हमें इस प्रकार का ज्ञान हो जाता है तो हमारे समस्त दुख नष्ट हो जाते हैं! लेकिन हमें यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं बल्कि व्यावहारिक होना चाहिए! हमें इसके लिए गहन अभ्यास करना होगा, तभी हम हाथ में रखे आंवले की भांति आत्मा को जान पाएंगे! और हम आत्मज्ञान के द्वारा यह भी जान जाते हैं, कि हम जहां भी रहते हैं उस दिव्य देश में ही रहते हैं! हम जो भी करते हैं, वह सब आत्मा का ही कार्य होता है! और तब हमारे द्वारा स्वभाविक ही निष्काम कर्म होने लगते हैं! क्योंकि हमारी समस्त सांसारिक वासनाएं नष्ट हो चुकी होती हैं! और इस प्रकार हम परम सुखी हो जाते हैं! तब हमें कण-कण में आत्मा के दर्शन होने लगते हैं! हम जानने लगते हैं, कि हमारा यह चैतन्य और परमात्मा दोनों एक ही हैं! और वह परमात्मा सर्वत्र है! सर्वव्यापक है! और हम भी वही हैं! उससे अलग नहीं हैं! यही आत्मदर्शन की सीढ़ी है, कि अपने को सर्वत्र और सबमें देख पाना और अनुभव करना! मित्रों में भी एक साधक ही हूं! कोई सिद्ध पुरुष नहीं! बस अपने मन में आए हुए इन विचारों को आपसे शेयर कर रहा हूं, शायद आपके जीवन में यह कुछ काम आएं! आपके ज्ञान में कुछ उन्नति हो सके। इस लेख में इतना ही, और इसी विषय पर हम आगे भी यह ज्ञान चर्चा जारी रखेंगे। लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद आपका दिन शुभ हो।









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