जीवन की ज्ञान यात्रा( तीसरा भाग)
ज्ञानी पुरुष की पहचान …एक प्रश्न अक्सर हमारे सामने आता ही रहता है कि ज्ञानी कौन है? हम किसे ज्ञानी कहें? क्या उसकी कोई वेशभूषा है? जिससे हम उसे पहचान कर उसे ज्ञानी कहेंगे! क्या गृहस्थ में रहने वाला पुरुष ज्ञानी नहीं हो सकता? या ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता? दोस्तों सभी के विचारों में कुछ भिन्नता हो सकती है! परंतु एक बात तो सत्य है, कि ज्ञानी का अर्थ है, ज्ञान को धारण करने वाला! ज्ञान को समझने वाला! चाहे फिर वह किसी भी क्षेत्र में है! चाहे वह गृहस्थी है! या कोई सन्यासी या कोई साधु या कोई किसान या सरकारी ऑफिसर या कोई मंत्री या प्रधानमंत्री कोई भी हो सकता है। ज्ञानी कोई पीले कपड़े पहनने से नहीं होता, ना ही ज्ञानी कोई विशेष टोपी लगाने से होता है! और ना ही कोई विशेष अच्छा सा नाम रखने से होता है! जैसे कि योग सम्राट श्री श्री जी महाराज! ऐसे नाम रखने मात्र से कोई ज्ञानी या योग सम्राट नहीं हो जाता! ज्ञानी का मतलब है कि उसमें आध्यात्मिक समझ का विकसित होना! फिर वह अपनी जीवन यात्रा चलाने के लिए, कोई प्राइवेट कार्य कर रहा है या कोई नौकरी उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह किसी भी क्षेत्र में हो सकता है, लेकिन यदि उसकी आध्यात्मिक समझ विकसित हो चुकी है, उसे ज्ञान मार्ग में, ध्यान करने में, आत्म ज्ञान क्या है परमात्मा को पाने का कौन सा मार्ग है? इसके समझने में गहरी रुचि है तो वह अपने सांसारिक कार्य करते हुए भी, अपने ज्ञान की समझ को विकसित कर सकता है, और एक अच्छा और सच्चा ज्ञानी हो सकता है! इस बात में किसी को भी, कुछ भी, संदेह नहीं होना चाहिए! अपनी साधना को वह धीरे धीरे बढ़ा सकता है। और अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
साधना का मार्ग… एक गृहस्थी और सांसारिक साधक भी इस संसार से पार हो चुके महान सद्गुरु और महापुरुषों की शरण में जाकर उनके निर्देशन में अपनी साधना को आरंभ कर सकता है और वह अपने उद्देश्य में अपने ज्ञान मार्ग में काफी आगे तक जा सकता है जिसको प्राप्त करने के लिए योगी और सन्यासी इस सांसारिक जीवन का ही त्याग कर देते हैं! यहां तक कि वे सभी सांसारिक वस्तुओं का त्याग कर करके, दिगंबर वेश धारण कर लेते हैं। लेकिन यदि आप इस गृहस्थ जीवन में ही अपने महागुरु के मार्गदर्शन में सच्ची और गहरी लगन से अपनी साधना को कर रहे हैं, तो आप उनकी सहायता से बहुत शीघ्र ही अपने साधना के मार्ग में उन्नति कर पाएंगे! बस आवश्यकता है, पूर्ण श्रद्धा के साथ! आत्म चिंतन करते हुए अपनी साधना को निरंतर करते रहना! तभी हम अपने लक्ष्य में कामयाब हो पाते हैं! परंतु यह सब बातें केवल सोचने से या केवल पढ़ने से नहीं होती! इन सब बातों को अपने अंतः करण में, अपने जीवन में गहराई से उतारना होता है! उस पर अमल करना होता है सच्चे मन से उस साधना मार्ग पर चलना होता है!तभी हम अपने आप को, इस रहस्यमय विश्व को! और इसके संपूर्ण रहस्य ज्ञान को समझने में कामयाब हो सकते हैं । ज्ञान का अर्थ है, कि मैं इस समय जहां पर खड़ा हूं, जिस भी स्थिति में हूं, वहां मेरा क्या कर्तव्य है? कौन से और किस प्रकार से और कैसे कर्म करने से? मैं अपने सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में उन्नति कर पाऊंगा! यदि हमने इस प्रकार की गहन समझ अपने भीतर विकसित कर ली है! तब फिर हम अपनी ज्ञानसाधना में, सन्यासी साधकों से भी, कहीं आगे बढ़ सकते हैं! क्योंकि इस संसार में, हर पल, हमारी सदैव परीक्षा ही होती रहती है! और जब हम इन सभी कठिनाइयों को पार करते हुए, अपने सच्चे मन से साधना करते हुए आत्मज्ञान को प्राप्त करते हैं! तो हम महाकर्ता! महाभोक्ता! और महत्यागी हो जाते हैं! जैसे कि भगवान श्री कृष्ण और श्री राजा जनक जी जो एक राजा होते हुए भी महा ज्ञानी थे।
गृहस्थ आश्रम या संयास आश्रम …मित्रों एक दूसरा प्रश्न भी सामने आता है कि यदि कोई व्यक्ति सन्यास ले कर योग ध्यान में ही अपने जीवन को व्यतीत करता है! और गृहस्थ जीवन में प्रवेश ही नहीं करता तो क्या उसका यह मार्ग बिल्कुल ठीक है? कुछ लोग कहते हैं, कि गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा है! और कुछ का मानना है, कि सन्यासी का योग मार्ग सबसे बड़ा है। मेरी समझ से तो दोनों ही मार्ग उत्तम हैं। जो महाज्ञानी साधक गृहस्थ जीवन में अपनी साधना को कर रहे हैं! और गृहस्थी के कार्य को भी कर रहे हैं! और दूसरों को शिक्षा भी दे रहे हैं! उनका मार्ग सन्यासी की अपेक्षा थोड़ा कठिन तो है ही! लेकिन उनसे उत्तम भी है क्योंकि ऐसे साधक समाज कल्याण भी साथ-साथ कर रहे हैं और चारों तरफ मौजूद सांसारिक आकर्षणों से अपने को बचाते हुए आत्म संयम के साथ धैर्य पूर्वक अपनी साधना में लगे रहते हैं और अच्छे कर्मों को दूसरों से भी करवाते हैं इससे समाज का बहुत कल्याण भी इसलिए उनकी साधना सन्यासी जीवन की साधना के मुकाबले थोड़ी कठिन भी है ही। और दूसरी और सन्यासी साधक जो अपनी साधना के लिए इन सांसारिक जीवन का त्याग कर चुके हैं! जिन्हें केवल आध्यात्मिक साधना में ही रुचि है! वह सदैव एकांत में ही अपनी साधना में लगे रहना चाहते हैं! वह अपने समय को बिल्कुल भी सांसारिक कार्य के लिए खर्च करना नहीं चाहते! और उनका विचार यह होता है, कि यदि वह अत्यधिक सांसारिक कार्यों में रूचि रखेंगे! तो उनसे शायद गलती हो सकती है! और वह अपनी साधना से कभी पतित भी हो सकते हैं! इसी बात को ध्यान में रखते हुए, ऐसे साधक इन सांसारिक आकर्षणों से दूर रहना चाहते हैं! लेकिन कुछ साधकों को यह विचार हो सकता है कि उन्हें सांसारिक कार्यों में कोई रूचि है ही नहीं! वे तो केवल सत्य की खोज में ही लगना चाहते हैं! सत्य की खोज में ही अपने जीवन को व्यतीत करना चाहते हैं! यह उनकी अपनी आंतरिक सोच है, और ऐसे साधक अपनी रूचि के अनुसार बाल्यावस्था के बाद, सीधे ही सन्यास आश्रम में प्रवेश करके, अपना संपूर्ण जीवन, ध्यान साधना में ही व्यतीत करते हैं। कुछ साधक संयास आश्रम में भी अपनी योग और आत्मज्ञान साधना में सफलता प्राप्त करके अपनी शरण में आए हुए सांसारिक साधकों की साधना करने में और अनेक प्रकार से उनकी सहायता करते हैं और अपने स्वयं के अनुभव से उन्हें समझाते हैं, कि वह किस प्रकार से अपनी साधना को आसानी से अपने गृहस्थ जीवन में भी कर सकते हैं। अपने जीवन को ज्ञान मार्ग पर ले जा सकते हैं। मित्रों ऐसे साधक और ज्ञानी महापुरुष कर्म के महा रहस्य को समझ चुके हैं! और उन्हें अब इस गृहस्थी जीवन में रहने का मन नहीं करता! उन्हें अब एकांत ही अच्छा लगता है! जहां वह ध्यान और समाधि लगा सके! मित्रों ऐसे ज्ञानियों का त्याग स्वभाविक ही होता है! और वह महाज्ञानी और महत्यागी कहे जाते हैं। क्योंकि ऐसे साधकों ने अपने साधना रूपी इमारत की नींव को पहले से ही बहुत मजबूत बनाया हुआ है। उन्होंने यम- नियम, आसन, प्राणायाम आदि करके, बहुत मेहनत से अपने शरीर को ध्यान के लिए तैयार कर लिया है! और अब उनका मन इस रहस्यमय विश्व प्रहेलिका! को खोजने में ही लगता है! उनकी रूचि सत्य की खोज में इतनी अधिक हो गई है! कि उन्हें यह सांसारिक जीवन नीरस दिखाई पड़ता है! वे यह जानना चाहते हैं कि आखिर परम सत्य क्या है? हम आखिर साधना करते हुए कहां तक पहुंच सकते हैं? यह शरीर क्या है? इसके भीतर मन, बुद्धि, अहंकार आदि यह सब क्या हैं? अंतःकरण क्या है? इन सब बातों को समझते हुए, वे साधक धारणा, ध्यान और समाधि में पारंगत हो चुके हैं! और वे समाधि लगाकर ही अधिक से अधिक सत्य ज्ञान के अनुसंधान में ही! अपना समय व्यतीत करना चाहते हैं! धीरे-धीरे उनके सामने योग के रहस्य खुलते जाते हैं! और वह योग शक्तियों के विषय में वह काफी कुछ जान पाते हैं! कुछ साधकों की शक्तियां इतनी अधिक विकसित हो जाती हैं! कि वे पल भर में ही कुछ भी चाहे कर सकते हैं! उनकी इच्छाशक्ति इतनी तीव्र हो जाती है कि यदि वे नदी के भीतर बैठकर यह इच्छा करें कि इस नदी का जल दूध बन जाए तो ऐसा तत्काल हो जाता है! अनेक साधकों ने ऐसा करके दिखाया है! इसके दिव्य उदाहरण हैं, श्री तैलंग स्वामी जी! जो काशी में निवास करते थे, और 300 वर्षों तक उन्होंने इस भौतिक जीवन मैं लीला की थी! कई बार गंगा जी में स्नान करते हुए, उनकी इच्छा दूध पीने की हुई तो अपनी तीव्र इच्छा शक्ति के बल पर उन्होंने मीलो तक गंगा जी के जल को दूध में परिवर्तित किया। इसके अलावा भी हिमालय की गुफाओं में अनेकों साधक घोर साधना में लगे हुए हैं! कुछ साधकों के नाम संसार जान पाता है! जैसे कि महायोगी श्री श्याम चरण लाहिड़ी जी के महागुरु श्री महावतार बाबाजी! इनकी दिव्य शक्तियों के बारे में अनेकों कहानियां सुनी जाती हैं। लेकिन मित्रों यह बात सभी सन्यासियों के लिए सत्य नहीं है। यह बात उन्हीं के लिए सत्य है, जो कि वास्तव में सच्चे आध्यात्मिक साधक हैं! और स्वभाव से विरक्त हो चुके हैं। एक दूसरे प्रकार के सन्यासी भी होते हैं, जोकि जोश में आकर, दिखावे के लिए, या अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति भी, पीले वस्त्र धारण कर सन्यासी बन जाते हैं! लेकिन वहां बैठकर भी वे अपने मन में सांसारिक भोगों का चिंतन ही करते रहते हैं! फिर वे मिथ्याचारी और ढोंगी कहे जाते हैं। आजकल ऐसी सन्यासियों की भीड़ इकट्ठा हो गई है, और यह सन्यासी अपने को योग सम्राट और महात्यागी श्रीजी के पोस्टर लगाए हुए, अपने-अपने आश्रम बनाकर बैठे हैं! जहां वे मौका मिलते ही दुराचार करने से नहीं चूकते! अपने को ब्रह्म ज्ञानी और भगवान बता कर अपने शिष्यों को भ्रमित करते रहते हैं। ऐसे लोग कुछ प्राचीन धर्म वाक्यों का सहारा लेकर अपने शिष्यों को भी भ्रमित करते रहते हैं। मित्रों ऐसे ढोंगी साधु महात्माओं से हमें अत्यंत सावधान रहना चाहिए क्योंकि वास्तविक ज्ञानी या साधु कौन है? उनका कैसा अचार है? हमें इस बात को ध्यान से परखना चाहिए! हमें यह नहीं देखना चाहिए कि इनका आश्रम बहुत बड़ा है! इनके मानने वाले बहुत ज्यादा हैं! या इनके पास बहुत सारा धन है और देश विदेश में इन्हें लोग बहुत ज्यादा मानते हैं! और इनकी प्रसिद्धि भी बहुत ज्यादा है! इन सब बातों से कोई व्यक्ति ज्ञानी नहीं हो जाता! वह केवल मशहूर हो गया है! इसका मतलब यह नहीं है कि वह ज्ञानी है! क्योंकि मशहूर तो फिल्मी कलाकार और बड़े-बड़े बदमाश और राजनीतिक नेता भी हो जाते हैं! लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे वास्तविक आत्मज्ञानी और महापुरुष हैं! उनकी करनी और कथनी में क्या कुछ अंतर है? इस बात को हमें बड़े ही ध्यान से समझना होगा, तभी हम सच्चे महापुरुषों को पहचान सकते हैं! और उनकी शरण में जाकर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। और ज्ञानी की पहचान केवल धन और प्रसिद्धि के आधार पर बिल्कुल नहीं हो सकती और फिर ज्ञानी भी मनुष्य ही होते हैं उनकी पहचान ऐसे नहीं कि उनके सिर में सीग होते हैं जिससे हम उन्हें पहचान ले! बस उनकी शरण में जाने से गहन शांति और संतोष का अनुभव अवश्य होता है।
उपसंघार… यदि कोई व्यक्ति पूर्ण ज्ञानी नहीं है! तो वह एक अच्छा साधक हो सकता है! यनी वह एक अच्छा साधु जीवन व्यतीत कर सकता है! अपने ज्ञान और ध्यान के मार्ग पर, अपना सारा समय खर्च कर सकता है! और गृहस्थ जीवन में न जाकर, सीधा सन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता है! और अपने जीवन को समाज कल्याण और ज्ञान प्राप्ति के लिए समर्पित कर सकता है! और बड़ी गहराई से उसमें प्रयास करता रह सकता है! जैसे स्वामी विवेकानंद जी, संत भगिनी निवेदिता जी, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी योगानंद सरस्वती आदि आदि. लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि हम ज्ञान प्राप्ति के लिए सन्यासी ही बनें। हम अपने गृहस्थ जीवन में रहकर भी पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं! आवश्यकता है हमें इसके लिए अपनी सच्ची लगन के साथ और सच्चे संतो और महापुरुषों के निर्देशन में साधना करते रहने की। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि सदग्रंथों को पढ़कर ही अपनी समझ को गहराई से विकसित कर पाएं और आत्मज्ञान के पथ पर आगे बढ़कर सफलता को प्राप्त करें! ऐसे में वही सदग्रंथ ही हमारे सद्गुरु हो गए जैसे कि योग दर्शन, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, श्री महारामायण योग वशिष्ठ इन सभी ग्रंथों में हमें बहुत ही सरल भाषा में गुरु और शिष्य के संवाद के माध्यम से साधना मार्ग को सरलता से बतलाया गया है और शायद उसे कोई भी समझ सकता है! बस हमारे भीतर आत्मज्ञान प्राप्त करने की गहरी लगन होनी चाहिए। मित्रों इस लेख में इतना ही और इसी विषय पर हम आगे और भी विस्तार से चर्चा करते रहेंगे! इन विचारों को पढ़ने के लिए धन्यवाद आपका दिन शुभ और मंगलमय हो! ओम शांति! शांति! शांति!






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