जीवन विचार मंच( प्रथम भाग)

 पवित्रता की बात!... 


 मित्रों जब भी कभी चार मित्र आपस में बैठकर कुछ चर्चा करते हैं या किसी धर्म सभा में किसी विषय पर चर्चा शुरू होती है कि कौन महात्मा है? कौन ढोंगी है? किस महिला का चरित्र अच्छा है? कौन दुशचरित्र है? कौन पतिव्रता है? कौन चोर है?कौन साधु है? उस ज्ञान चर्चा में, हम सभी अपना सुंदर पक्ष तो सबके सामने रखते हैं! अपनी दान और वीरता की कहानियां सबको सुना देते हैं और  अंधेरे में की गई गलतियों को हम सभी छुपा कर रखते हैं! यदि हमने उन गलतियों से कुछ सबक लेकर कुछ सीख कर और प्रायश्चित करके उन्हें छोड़ दिया है! तो बहुत अच्छी बात है! और हमारी समझदारी है! लेकिन कुछ के लिए तो यह गलतियां गलतियां ही नहीं होती! बल्कि उनके आगे बढ़ने का, प्रसिद्धि पाने का मार्ग होती हैं! अपने इस लेख में हम पवित्रता और  अपवित्रता के इसी विषय पर चर्चा करेंगे। 

          


   एक छोटी सी कहानी… मित्रों वर्षों पुरानी बात है! उस समय मेरी एक छोटी सी कॉमिक्स, उपन्यास,  पत्र पत्रिकाएं आदि किराए पर देने की, किताबों की दुकान थी। सभी प्रकार के ग्राहक आते रहते थे, बच्चे, बूढ़े और जवान! उनमें एक लड़की करीब 18-20 वर्ष की उम्र रही होगी, वह भी पुस्तक किराए पर लेने आती थी, अच्छी खासी सुंदर भी थी। मुझे किसी ने बताया कि यह लड़की चरित्रहीन है! शायद वेश्यावृत्ति करती है! किसी के कहने से क्या है! लोग किसी के बारे में कुछ भी कह देते हैं और फिर मुझे क्या लेना था, मेरी तो वह रोजाना की ग्राहक थी और ग्राहक भगवान के समान होता है! मुझे उस में कभी कोई गलत बात नजर नहीं आई! सामान्य थी! पुस्तक ले जाना, पढ़ने के बाद, फिर वापस कर देना, बस इतना ही संपर्क था,उसका और हमारा! नाम मुझे ध्यान नहीं है! शायद रेशमा होगा, चलो रेशमा ही मान लेते हैं। दुकान पर उसका आना लगभग नित्यप्रति या एक दिन छोड़कर  ही होता था।कभी  कभाक थोड़ी बहुत बातचीत भी हो जाती थी, लेकिन सिर्फ कहानी और किताबों के बारे में! वह सिर्फ बच्चों के कार्टून, चंपक, कॉमिक्स आदि ही पढ़ती थी। एक दिन दुकान में कोई नहीं था, दोपहर का वक्त था, रेशमा किताब वापस करने आई और दूसरी किताबें देख रही थी। मैंने रेशमा से कहा, रेशमा तुम कौन सी कंपनी में जॉब करती हो? प्रश्न सुनकर उसने अजीब सी निगाहों से मुझे देखा! और कहां, लालाजी, जॉब तो मैं  करती हूं! मगर कंपनी, तुम्हें क्या बताऊं! कंपनी कोई भी  हो, जहां भी काम मिल जाए, करती रहती हूं! लालाजी आप एक सीधे-साधे सरल इंसान हैं! इसलिए आपको बता रही हूं कि मेरा जीने का रास्ता बहुत अच्छा नहीं है! और मैं भी कोई अच्छी लड़की नहीं हूं! घर की परिस्थिति भी  अच्छी नहीं है! दो छोटी  बहनें  और एक छोटा भाई और एक मां घर में है। भाई-बहन स्कूल में पढ़ते हैं, मां कुछ बीमार रहती है, सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर ही  है।मैं तो जैसी हूं वैसे  हूं ही, लेकिन अपने भाई बहनों को अच्छी राह पर ले जाना चाहती हूं! उनके जीवन को सफल बनाना चाहती हूं! अपनी मां की जितनी सेवा कर सकूं! बस यही मन में चाह रहती है! जहां भी नौकरी करने जाती हूं, लोग बस मेरा जिस्म देखते रहते हैं! उसी के आधार पर नौकरी मिलती है, लोगों को मेरा चरित्र खराब दिखाई देता है! मगर मैं क्या करूं? मजबूरी है, अपने परिवार को  तो पालना है ही! मेरा जीवन तो शायद यूं ही खत्म हो जाएगा। शादी मुझसे कौन करेगा? लेकिन मैं चाहती हूं,मेरे भाइयों और बहनों का जीवन ठीक हो जाए, वे तीनों अच्छी राह पर चलें! बस अब तो जीवन का यही उद्देश्य रह गया है। आपने भी कुछ मेरे बारे में सुना ही होगा। मेरे बारे में उनकी राय अच्छी नहीं होगी! लेकिन मैं क्या करूं? इस दुनिया के काले दलदल  में फंसी हुई हूं, मुझे कौन निकाल सकता है! यह दुनिया बहुत मतलबी है, सभी अपना मतलब निकालते हैं! अब आप ही बताइए कि मेरा रास्ता कितना गलत है? गलत हो सकता है,लेकिन मेरा मकसद शायद गलत नहीं है!मेरा जीवन तो बेकार हो ही गया है! मगर मैं अपने परिवार का जीवन बेकार नहीं होने दूंगी। उन्हीं के लिए मैं यह सब करती हूं। आप कुछ भी समझे! आपकी निगाह में मैं चरित्रहीन हो सकती हूं! मैंने कहा, 'नहीं-नहीं रेशमा ऐसी बात बिल्कुल नहीं है' कोई कुछ भी कहे मेरी निगाहों में तुम एक समझदार हिम्मतवाली और अच्छी लड़की हो! रेशमा अगर मौका मिले,और कोई बहुत अच्छा, भले विचारों वाला, समझदार दोस्त मिल जाए, जो तुम्हारी सारी परेशानियों को समझता  हो और तुम्हारा साथ दे, तुम उससे तुरंत शादी कर लेना। दुनिया बहुत बड़ी है, कहीं भी रह लेना, तुम में कोई कमी नहीं है, तुम पतित  नहीं हो! बल्कि परिस्थितियों से लड़ रही हो, तुम्हारी कभी कोई मदद कर सका तो अपने को धन्य ही समझूंगा। मेरा उत्तर सुनकर उसकी आंखों में आंसू आ  गए और कहने लगी, लाला जी इस दुनिया में बहुत कम लोग हैं! जो दूसरे के दर्दों को समझते हैं और महसूस करते हैं! फिर वह किताब लेकर चली गई और मैं सोचता रहा! उन लोगों के बारे में, जो बाहर से तो बड़े साफ-सुथरे तिलक लगाए! पूजा पाठी नजर आते हैं मगर मौका मिलते ही दूसरे की मजबूरी का फायदा उठा कर उसका शोषण करने से नहीं चूकते! और यदि कोई उनसे उनके द्वारा शोषित लड़की या औरत के बारे में भी पूछ ले तो  तुरंत ही कहेंगे की अरे वह तो बहुत गंदी है!पैसा दे दो कुछ भी कर लो और हम तो राम-राम ऐसी गंदगी  से कोसों दूर  रहते हैं। फिर चाहे व्यभिचार के क्षणों में उसके पैरों को चाटते हो! 


               हमारा रहस्यमय समाज!... मित्रों मानव समाज बहुत रहस्यमय है! जिनमें ऐसे अपराधी प्रवृत्ति के लोग बहुत हैं, जिनका चरित्र दोहरा होता है! बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और!  जिन्हें पहचानना भी बड़ा ही मुश्किल होता है! अब तो ऐसे लोगों की लिस्ट बहुत लंबी हो गई है! और कुछ कि तो सार्वजनिक भी हो गई है इनमें से कुछ लोगों ने तो स्वयं को ही भगवान घोषित कर दिया था जैसे आसाराम,राम रहीम यह तो अब सीधे जेल के अंदर ही पहुंच गए, जबकि पहले तो यह अपने को आधुनिक कृष्ण और भगवान बताते थे! लेकिन उन्हें जहां होना चाहिए था, अब वह वहीं पहुंच गए हैं! खैर इनका तो पता चल गया है,अभी भी ऐसे बहुत सारे सफेदपोश! भगवापोश हैं! जो कि इस समाज के अंदर छुपे बैठे रहते हैं  और वे बाहर से तो बहुत पवित्र दिखाई पड़ते हैं लेकिन यदि उनके अंदर झांक लिया जाए तो वहां इतनी गंदगी भरी होती है! इतना स्वार्थ भरा होता है कि उन्हें किस की उपमा दी जाए वह तो मनुष्य के रूप में समझो जानवर ही होते हैं! जो कि सिर्फ केवल अपना स्वार्थ पूरा करना जानते हैं और दूसरे को पशु की भांति समझते हैं। वास्तव में तो वे खुद ही एक पशु होते हैं। ऐसे जानवरों की संख्या दुनिया में बहुत ज्यादा है लेकिन कुछ के नाम ही सामने आ पाते हैं बाकी सब छिपे हुए रहते हैं और सफेद शांति का लबादा ओढ़कर जीवन व्यतीत करते हैं और रात के अंधेरे में बहुत ही गंदे आचरणों में लगे रहते हैं! कोई भी जो  उनके निकट आता है उन्हें वह  वह सिर्फ  वासना और मतलब निकालने  की निगाहों से ही देखते हैं! मित्रों मन पर संयम रखना बहुत कठिन तो है ही लेकिन ऐसा नहीं है कि असंभव है! प्रयास करने से सब कुछ हो सकता है। स्वामी विवेकानंद जी ने जब अमेरिका में धर्म सभा में भाषण दिया था और संबोधन किया था 'मेरे अमेरिकन भाइयों और बहनों' वह संबोधन उनके सच्चे हृदय से था! इस संबोधन से ही काफी देर तक वहां तालियां ही बजती रही थी। दूसरे जितने भी बड़े-बड़े धर्म प्रचारक वहां पर आए हुए थे वे सभी अपने सामने उपस्थित श्रद्धालुओं  को सिर्फ प्रिय  श्रोताओं या लेडीस एंड जेंटलमैन इस प्रकार के संबोधन करते थे। सच्चे मन से भाई या बहन कहना बहुत मुश्किल है! मन के किसी कोने में वासनाओं के विचार भ्रमण करते ही रहते हैं। मन को रोकना असंभव तो नहीं है, थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन ईमानदारी होनी चाहिए!  श्री ओशो रजनीश जी के विचार सेक्स जीवन के प्रति बहुत खुले हुए थे! उन्होंने कभी भी, कुछ भी, छुपा कर नहीं रखा! जो भी कहा, साफ-साफ कहा, कि मेरे विचार में कामवासना शरीर की एक सामान्य जरूरत है! वह जैसे दूसरों में है वैसे ही मुझ में भी है! मैं इससे  कोई परहेज नहीं करता हूं! बल्कि सब कुछ करता हूं। इससे मुझे कोई एतराज या परहेज नहीं है! मैं झूठ क्यों बोलूं ? मेरी साधना का  रास्ता तो इन गलियों से होकर ही गुजरता है और मुझे वही पसंद भी है! यदि किसी को मेरे विचार अच्छे लगते हैं तो  मेरे निकट आए, नहीं लगते हैं तो नहीं आए!  हो सकता है मैं गलत हूं? लेकिन मेरी सोच यही है कि कुछ गलत नहीं है! मन में जो है, उसको बाहर निकाल देना चाहिए! इस बारे में तो उन्हें ईमानदार कहा जाना चाहिए लेकिन वह भी स्वयं प्रसिद्धि की दौड़ में दौड़ लगाते ही रहे,  यहां तक की उन्होंने खुद को भगवान भी घोषित कर दिया था! और कहा था, कि मैं तो एक जागृत आत्मा हूं और इसलिए भगवान ही हूं! जब किसी ने पूछा कि महाराज जी आप भगवान हो तो क्या आपके पास सिद्धियां हैं? तो उनका उत्तर होता था कि, सिद्धियां तो मेरे पास हैं लेकिन मेरे पास इससे भी बड़ी एक और भी सिद्धि है कि मैं उनका प्रदर्शन नहीं करता! बात उनकी सही हो सकती थी!  लेकिन यदि कोई मौका खतरनाक आ जाए! और कुछ दिखाना ही पड़ जाए तो वहां पर शक्ति को दिखाने से परहेज भी नहीं होना चाहिए! लेकिन दिखाए तो तब जब कुछ हो! वहां तो कुछ था ही नहीं बस केवल कोरी बातें दूसरों की आलोचना करना उन्हें गलत ठहराना जब कोई सिद्धि या कोई योग शक्ति आपके पास होगी ही नहीं तो दिखाओगे क्या?चलो मान लिया जाए कि आपके पास सिद्धियां है! और आप खुद को भगवान भी कह रहे हैं! और एक ऐसा मौका आ गया है कि भक्तों की श्रद्धा को कायम रखने के लिए कुछ शक्ति प्रदर्शन करना ही पड़ेगा फिर परहेज नहीं होता, कुछ ना कुछ दिखाना ही पड़ता है! तभी दुनिया मानती है कि आप महापुरुष हैं! आप एक अवतार हैं! या आप भगवान हैं! या आप कोई  सिद्ध पुरुष हैं! केवल शब्दों के माया जाल से अपने को भगवान तो कह दिया लेकिन उस पद को संभाल नहीं पाते। खुद को हंस-हंस कहते रहती हूं  लेकिन जैसे ही मांस का टुकड़ा जमीन पर दिखा फिर तो उनका हंस रूप खत्म और वे तुरंत ही चील बनकर नीचे गिर जाते हैं और उनकी हकीकत सामने आ जाती है। ऐसे ही रजनीश महाराज भी नकली भगवान  थे । जिंदगी भर गरज गरज कर भाषण करते रहे दूसरों की आलोचना ही करते रहे बड़े-बड़े ग्रंथों के सूत्रों पर  भाषण दिए विज्ञान भैरव तंत्र के सभी सूत्रों पर भाषण किए और सब को बतलाया समझाया कि खुद को पहचान लो और समझ लो  कि मैं कौन हूं? दूसरों को समझाते रहे कि ऐसा कर लो, वैसा कर लो! तुम ऐसे हो जाओगे, ऐसे ध्यान कर लो, लेकिन खुद कभी क्या  स्वयं को समझा? या वे स्वयं अपने को पहचान पाए? महापुरुष तो पहले ही कहने लगते हैं कि मैं उस दिन इस दुनिया से  महाप्रस्थान करूंगा! इतना तो  वे जान ही जाते हैं लेकिन कुछ नहीं बता पाए और बीमार होकर मौत हो गई! नहीं जान पाए कि मुझे कब जाना है? इस जीवन का क्या रहस्य है? जीवन क्या है ?और मृत्यु क्या है? सिर्फ शब्दों को ही इधर-उधर  बाजीगर  की भांति बजाते रहे! दुनिया को कहते रहे कि देख लो मैं कितना महान हूं! इतना कि मेरे आगे सब छोटे हैं! तंत्र के महान प्रणेता श्री शंकर भगवान को भी  इस प्रकार से संबोधित किया कि तंत्र के प्रणेता 'शिव' ने ऐसा कहा उन्हें शिवजी या भगवान शिव न कह सके वह सब इसलिए कि सब समझे कि देखो रजनीश कितने बड़े भगवान हैं कि हिंदुओं के श्री महादेव जी भी उनके  सामने बालक समान हैं! इनकी मूर्खता पर हंसी आती है! कि मैं बहुत बड़ा ज्ञानी और शब्दों का जादूगर हूं! मैं बाल की खाल निकालना जानता हूं  नाम ओशो रख लिया है चांदी की सुनहरी टोपी पहन ली है और घोषणा कर दी कि मैं तो हूं ही भगवान! इन सब कोरी बातों से  क्या कोई भगवान बन जाता है! शक्ति है नहीं और शक्तिमान बनने की घोषणा कर दी है और जब शक्ति दिखाने का भक्तों की आस्था कायम  रखने का मौका सामने आया तो कुछ कर ही नहीं पाए अरे भाई वहां कुछ  तो करके दिखाया होता लेकिन दिखाएंगे क्या वहां तो कुछ है ही नहीं! तो? कभी संत महापुरुषों के सामने ऐसा मौका आ भी जाता है कि कुछ प्रदर्शन करना ही पड़ता है जितने भी बड़े-बड़े महापुरुष हुए है जिनमें चाहे संत वशिष्ठ जी हों विश्वामित्र जी हों तुलसीदास जी हों संत ज्ञानेश्वर जी हों श्री परशुराम जी हों श्री गोरखनाथ जी हों श्री तैलंग स्वामी जी हों श्री श्याम चरण लाहिरी की हों सभी को कभी-कभी कुछ दिखाना भी पड़ जाता है तभी तो लोग धर्म और ईश्वर में आस्था रखते हैं और उनकी आस्था कायम रहती है ।  रजनीश जी ने अमेरिका में राजनीशपुरम बसाया अमेरिकी सरकार ने कुछ गलत इल्जाम लगाकर उन्हें जेल में बंद कर दिया उन्होंने कहा कि वह इल्जाम तो गलत है लेकिन सरकार ने कहा गलत है या सही है आप यदि  माफी मांगते हैं तो हम आपको छोड़ देंगे वरना आप जेल में ही रहेंगे।  सिद्धियां दिखाने का मौका आ गया था! यदि आप वास्तव में भगवान हैं! शक्तिमान हैं! सिद्धियां आपके चरणों में हैं! तो उन्हें उस समय वहां प्रकट हो जाना चाहिए था! उस समय कुछ तो दिखाना चाहिए था लेकिन वहां तो कुछ था ही नहीं केवल किताबी बातें और कोरे भाषण थे! कुछ नहीं कर पाए, घबराकर क्षमा मांग ली! और हिंदुस्तान वापस आ गए और फिर कहा कि भारत से बढ़िया देश कोई नहीं है! हम यही रहेंगे यहां पूरी आजादी है, कुछ भी कहने की, कुछ भी करने की! भारत सच्चे अर्थों में प्रजातांत्रिक है! कोई कुछ नहीं कहता और फिर यहीं अपने जीवन की आखिरी सांस ली मरने से पहले यह भी नहीं जान पाए कि मुझे कब जाना है! जबकि अक्सर महापुरुष यह बता देते हैं कि उस दिन मैं संसार से चला जाऊंगा! काशी के प्रसिद्ध संत श्री तैलंग स्वामी जी को अंग्रेज सरकार ने दिगंबर रहने के अपराध में जेल में बंद कर दिया था लेकिन जब भी स्वामी जी की संध्या का समय होता था उनके बैरक में ताला लगा रहता था और भी निकल कर बाहर संध्या करते थे उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया उनकी बारी आई है पेशी के लिए खड़े हो गए और तत्काल अंतर्धान हो गए और मजिस्ट्रेट के पीछे प्रकट हुए और उनसे  बोले जो साहब तुम क्या चाहते हो? मजिस्ट्रेट ने भय और आश्चर्य में डूबकर तुरंत ही  आदेश किया कि स्वामी जी के एक सच्चे संत हैं जहां भी रहते हैं जैसी भी रहते हैं वही ठीक है इन्हें कभी परेशान नहीं किया जाए! और  कलयुगी संत आसाराम जी को लीजिए, बाहर तो भगवान! बड़े महान! नम्रतावान! शीलतावान! तिलकधारी! परम पवित्र! और अंधेरे में व्यभिचार की लीला! यही करते रहे! और आखिर में पकड़े गए और फिर जहाँ होना चाहिए था वहीं जेल के अंदर पहुंच गए! अब भगवानपना कहां गया? शक्ति कहां गई? सिद्धियां कहां गई? अरे भई! कहां कि सिद्धियां वहां तो कुछ था ही नहीं! कोरे जड़ मूर्ख हैं! सिर में मूर्खता और घमंड का सींग निकला हुआ है! बस फर्क इतना है कि वह हर किसी को  दिखाई नहीं देता! लेकिन ज्ञानी और समझदार तो पहचान लेते हैं कि इस मूर्ख के सिर में कितना बड़ा सींग उगा हुआ है और आखिर कानून ने  पहचान कर पकड़ ही लिया अरे! यह तो मनुष्य नहीं जानवर है और उसे पकड़ कर जेल में पहुंचाया गया।  लेकिन इतना सब कुछ सामने आने के बाद भी, कुछ जो जड़ मूर्ख और अंध भक्त हैं उन्हें अब भी समझ में नहीं आता कि यह व्यक्ति वास्तव में व्यभिचारी है,  धोखेबाज है, यह कोई महात्मा नहीं है! पीले कपड़े पहनने से कोई महात्मा नहीं हो जाता! सिर पर मुकुट लगाकर सुंदर कपड़े पहन कर बड़ी इलेक्ट्रिक पिचकारी से भक्तों से होली खेलने से क्या कोई भगवान बन जाता है अरे मूर्खों! उन श्री कृष्ण का  तो नाम लेने से ही शांति प्राप्त होती है तुम उनकी बराबरी कर रहे हो! अच्छे आचरण से ही कोई व्यक्ति सच्चा महापुरुष होता है।  वालीबुड की फिल्मी दुनिया में भी ऐसे अनेक पशु रहते हैं,जिनका व्यवहार अपनी बेटियों बहूओं और जो भी इनके निकट आए उसके साथ हमेशा गंदा ही रहा है।


                 उपसंघार… मित्रों पवित्र कौन है? अपवित्र कौन है? बड़ा ही विचारणीय प्रश्न है? मित्रों अक्सर हम वही काम करते हैं! जिन्हें हम  खराब बताते हैं! जिन्हें किताबों में खराब कहते हैं, हम उन्हीं कामों को छुपकर भी कर लेते हैं! और फिर अपने आप को पवित्र कहते रहते हैं! यह कथनी और करनी का गहरा फर्क है। सभी कहते हैं कि श्री सरदार भगत सिंह जी, श्री चंद्रशेखर आजाद  सच्चे महावीर  और देशभक्त थे! उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। लेकिन यह भी सभी  चाहते हैं कि वह दूसरों के घरों में ही पैदा हों! मेरा बच्चा तो अलग ही और सेफ रहे! देश को सुधारना क्या आसान बात है! यही विचार अक्सर सभी के मनों में रहता है। अपने देश के लिए जासूसी करना, जिनमें महिला जासूस भी शामिल होती हैं और वह अपनी जान पर खेलकर और अपना शरीर भी परोस कर अपने देश की रक्षा करने के लिए कुछ भी कर देती हैं! ऐसी महान  देवियों  को हम पवित्र कहेंगे या अपवित्र!  जो अपने देश के लिए अपना तन और मन सब कुछ अर्पण कर देती हैं! ऐसी  देवियां तो परम धन्य हैं! उन को बारंबार नमन है! मित्रों पवित्रता हमारी मन की भावना के अनुसार होती है, कि किसी के प्रति या अपने देश के प्रति हमारी भावना क्या है? कैसी है? यदि वह शुभ है! समर्पण वाली है! तो मित्रों वह अत्यंत पवित्र और शुभ  है।मित्रों विचार अपना-अपना है, अपनी समझ तो यह कहती है कि यदि आपकी भावना किसी के प्रति भी चाहे वह देश हो या परिवार या कोई मित्र या कोई साथी या कोई भी व्यक्ति अच्छी है! कल्याणकारी है! तो वहीं पवित्रता और सच्ची प्रेम का निवास होता है। मित्रों इस लेख में इतना ही। इस ज्ञान चर्चा की कड़ी में हम आगे भी मिलते ही रहेंगे। लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद।

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