जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( छठा भाग)

 



सच्चे सुख की तलाश… थोड़ी फुर्सत सी हुई है तब मन में विचार आ रहा है कि मुझे सबसे अच्छा क्या लगता है मुझे किसकी चाहना हर पल रहती है मित्रों हम कुछ भी करते हैं हम चाहते हैं कि हमें उससे सुख मिले खाने में पीने में चाय में नाश्ता करने में  बात करने में स्पर्श करने में हंसी मजाक करते हुए हमें सुख मिलता रहता है यानी हमें हर पल यही चाह रहती है  कि मुझे सुख निरंतर मिलता रहे!  शरीर में कहीं भी जरा सी भी चोट लग जाए और दर्द हो जाता है, यदि सिर में दर्द हो जाए तो हम परेशान हो जाते हैं दर्द को तो हम तुरंत ही हटाना चाहते हैं। हमारे दांत में हमारे सिर में या चोट लगने से हड्डी में हुआ दर्द उससे हम अत्यंत परेशान हो जाते हैं हमारा पूरा ध्यान उसी को हटाने में लग जाता है किसी प्रकार यह खत्म हो क्योंकि इसके रहते तो जीवन में अन्य कार्य संभव ही नहीं हो पाता हल्का दर्द हो तो चल जाता है यदि तेज हो  जाए  तो उसके हटने से पहले हम कुछ भी नहीं सोच पाते नींद भी नहीं आती लेकिन दोस्तों यह यह दुख जो है हमें तनिक भी अच्छा नहीं लगता लेकिन बड़े आश्चर्य की बात है कि हमें सुख का पता भी तभी लगता है जब हमें कुछ दुख होता है दुख के बाद सुख आता है तब हमें सुख का अहसास होता है

                 


   
एक शिक्षाप्रद छोटी सी कहानी… एक बड़े व्यापारी ने बहुत पैसा कमाया, सुख सुविधा के सभी समान एकत्र  किए, बहुत अच्छी हवेली बनवाई और बहुत सारा रुपया एकत्र कर लिया! बच्चे बड़े हो गए थे और अपना-अपना अलग-अलग व्यापार भी कर रहे थे। सेठ जी सारे कार्य से मुक्त थे, लेकिन हमेशा बेचैन रहते थे! एक दिन उनके मुनीम ने उनसे पूछा, "सेठ जी क्या बात है? आप बेचैन से रहते हैं! सेठ जी ने कहा कि मुनीम जी मेरे पास पैसा तो बहुत है, बच्चों को भी बांट दिया है और मैंने अलग से भी  बहुत सारा पैसा एकत्र कर लिया है, लेकिन मुझे सुख और शांति का अनुभव नहीं हो रहा! वह सुख कैसे मिलेगा? कहां मिलेगा? मेरी समझ में नहीं आता! मुनीमजी ने सुझाया, "सेठ जी आप एक काम कीजिए" आप किसी ज्ञानी महापुरुष को ढूंढिए! वही आपको सच्चे सुख और शांति का एहसास करा सकते हैं।  सेठ जी ने सोचा कि बात तो मुनीम जी की ठीक है और फिर उन्होंने  अपना सारा धन इकट्ठा करके उसे सोने और हीरे के रूप में परिवर्तित करके एक थैले में रख लिया और अपने मन में यह विचार किया कि यदि कोई मुझे  सच्चे सुख का अहसास करा देगा तो मैं उसे अपना यह  सारा धन दे दूंगा और फिर इसके लिए सेठ जी ने यात्रा आरंभ की और सब जगह तलाश करते हुए घूमने लगे। घूमते- घूमते सेठ जी एक गांव में पहुंचे, उन्हें पता चला  कि यहां एक ज्ञानी महात्मा जी रहते हैं लेकिन वह थोड़े सनकी हैं! कब क्या कर दें, किसी की समझ में नहीं आता! उनका नाम भी पागल बाबा है!  लेकिन सभी कहते हैं कि बहुत ज्ञानी और पहुंचे हुए महात्मा है। सेठ जी ने लोगों से पूछा कि महात्मा जी कहां मिलेंगे? किसी ने बताया कि उनका कोई निश्चित ठिकाना नहीं है! कहीं गांव में घूमते हुए या गांव के बाहर जंगल में एक  छोटा सा मंदिर है, वहां भी मिल जाते हैं। सेठ जी उन्हें ढूंढते हुए गांव में गलियों में घूमने लगे। धन की पोटली उन्होंने  अपने बगल में दबा रखी थी।  अचानक कोई पीछे से आया और उनकी धन की पोटली  को लेकर भाग गया! सेठ जी उससे अपनी पोटली लेने के लिए पूरे जी-जान से दौड़ने  लगे। वह व्यक्ति और कोई नहीं, वही पागल बाबा था वे  उस धन की पोटली को लेकर सारे गांव की गलियों में दौड़ते रहे  और सेठ जी  उनके  पीछे दौड़ते रहे लेकिन पकड़ नहीं पाए! अंत में थक कर, अत्यंत निराश हो गए और रोने लगे, हाय! यह क्या हुआ? मेरा तो सारा धन ही लुट गया! सभी आश्चर्यचकित हुए पागल बाबा की इस हरकत को देख रहे थे और फिर  बाबा भागते हुए गलियों में गायब हो गए थे और सेठ जी हताश निराश होकर बाहर मंदिर के पास जाकर बैठ गए और रो कर कहने  लगे हाय! मेरा क्या होगा? मैं तो शांति की खोज में आया था, यहां तो मेरा सब कुछ ही लुट गया! मैं दुनिया का सबसे दुखी व्यक्ति हो गया हूं! अब क्या करूं? कहां जाऊं? उन को रोते हुए देख कर लोगों की भीड़ लग गई थी। सभी सोच रहे थे, यह बाबा क्या सचमुच पागल हो गया है? तभी कोई पीछे से आया और धन की उस पोटली को सेठ के सामने रख दिया! सेठ जी ने पोटली को देखा, तो अत्यंत खुशी से भर गए! निराशा तुरंत आशा में बदल गई! उन्होंने सिर घुमा कर देखा तो सामने वही पागल बाबा खड़े थे! बाबा मुस्कुराए और बोले, क्या तुम्हें सुख का अनुभव हुआ? जिसे तुम ढूंढ रहे थे!  सेठ ने कहा, "महाराज बहुत सुख मिला! बहुत चैन का अनुभव हो रहा है! तब बाबा ने  समझाया, 'अरे बावले सुख तो तेरे पास पहले से ही था! लेकिन तुझे उसका अनुभव नहीं हो रहा था क्योंकि उसे दिखाने वाला कोई नहीं था! दुख  आया तो उसने तेरे ही भीतर बैठे सुख का तुझे अहसास कराया! तेरी आत्मा के भीतर  ही अनंत सुख है,  सब तेरे भीतर ही है! और वही सच्चा सुख है जो कभी खत्म नहीं होता! उसी  सच्चे आत्म सुख में निवास कर!  तभी परम शांति मिलेगी! वह इतना विराट सुख है, कि उसे पाकर यह जीव उन्मत्त हो जाता है! बावला सा हो जाता है! और  मुझे  भी उसकी कुछ झलक मिल गई है! और उसे  पाकर मैं भी तो बावला हो गया हूं! तभी सब लोग मुझे पागल  कहते हैं!  सेठ को शिक्षा मिल गई थी, उसने सारा धन बाबा जी के चरणों में डाल दिया और कहने लगा, "बाबा जी आप मुझे शिक्षा दीजिए" मैं आपकी शरण में हूं! बाबा ने सेठ को उठाया और कहा, "इस धन को तू ले जा और इसे दीन दुखियों में बांट अधिक धन की कामना न कर केवल अपने जीवन निर्वाह के लिए बस रख थोड़ा सा रख और अपने सच्चे धन को अपनी आत्मा के भीतर  ही  खोज! उसी  में मन को लगा! तभी तेरा कल्याण होगा। सेठ को सच्ची शिक्षा मिल गई थी, उसने महात्मा जी के चरणों में प्रणाम किया और अपना सारा धन गरीबों में बांट दिया और घर जाकर अपने कर्तव्य कर्म करते हुए अपनी  सच्ची आत्मा की खोज में लग गया।

           


  
उपसंघार…मित्रों  सुख तो हमारे भीतर ही है! और वह सदैव हमारे पास ही रहता है! परंतु उसका एहसास हमें तब होता है जब हमें कोई उसका एहसास कराता है और जब दुख आकर कहता है कि पहचाना मुझे मैं हूं दुख मुझे पहचानो और फिर अपने सुख को भी जान! मित्रों हमें  गहराई में जाकर अपने सच्चे आत्म सुख की तलाश करनी है, जो की अनंत है, और सदैव हमारे पास ही है! वह कभी खत्म नहीं होता और यही हमारी सच्ची तलाश है! यही सत्य की खोज है! और  यही  हमारा और हमारे जीवन का सच्चा लक्ष्य है।मित्रों इस लेख में इतना ही। हम इसी वार्ता को यहीं से अगले लेख में भी जारी रखेंगे। लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद! आपका दिन शुभ हो!

                  


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