जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( चौथा भाग)
जीवन का रहस्यमय सफर… मित्रों जीवन एक सफर है! और हम इस संसार रूपी गाड़ी में सफर कर रहे हैं! गाड़ी चली जा रही है, सदैव से चलती जा रही है! और हम सब इसमें बैठे-बैठे सफर कर रहे हैं!मित्रों आपने यह मशहूर फिल्मी गाना तो सुना ही होगा," जिंदगी का सफर" है ये कैसा सफर! कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं! करते हैं, सब सफर! मगर, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं! है ये कैसी डगर! चलते हैं, सब मगर! कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं! बहुत गहरा सच है! इन गीत की पंक्तियों में! मित्रों हम सभी अपने अपने जीवन का सफर कर रहे हैं! लेकिन क्या हम इस जीवन के सफर के बारे में अच्छी तरह जानते हैं? कि हमारा यह सफर है क्या? और हमारे इस सफर की यह गाड़ी आखिर जाती कहां है? कौन से मुकाम पर इसे पहुंचना है? बहुत ही गहरा और जरूरी प्रश्न है? जिसे हमें जानना और समझना बहुत जरूरी है। इस लेख में हम इन सब बातों पर विचार करेंगे।
जीवन का सुहाना सफर… जिंदगी! एक सफर! है सुहाना! यहां कल क्या हो! किसने जाना! अंदाज़ फिल्म का यह गाना किशोर कुमार द्वारा गाया गया, राजेश खन्ना और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया जो सुनने और देखने में बहुत ही अच्छा लगता है! हमें ऐसी ही अपनी जिंदगी का सफर खुश होकर करना है। फिल्में भी हमें बहुत कुछ सिखाती हैं, बस है कि सीखने वाला चाहिए! मित्रों जब हम सफर करते हुए, मिलजुलकर, खुशियां बांटते हुए, एक दूसरे को खुश करते हुए, चलते हैं तो बहुत मजा आता है! और जीवन आनंदमय हो जाता है! कोई दिक्कत हो जाए तो उसे भी आपस में मिल बांटकर दूर कर लेते हैं, सचमुच बहुत अच्छा लगता है! जब हम किसी रेलगाड़ी में सफर करते हैं, उस समय हम एक दूसरे का कितना ख्याल रखते हैं! पानी चाहिए या और कोई भी चीज, हम तुरंत भाग कर ला कर देते हैं, और बहुत खुश होते हैं! नींद आ रही है, खाना खा लिया कि नहीं, एक दूसरे का बहुत ख्याल रहता है। हमारे पड़ोस में कोई बैठा है, हम उसका भी ख्याल रखते हैं! इसी प्रकार से यह जिंदगी भी चलती रहती है। मित्रों हम नित्य प्रातः काल उठते हैं और शाम तक कुछ न कुछ कार्य करते रहते हैं, इसमें कुछ जरूरी होते हैं, कुछ मनोरंजन के होते हैं और फिर रात्रि में विश्राम करते हैं, फिर प्रातः काल होने पर उन्हीं कार्यों में लग जाते हैं! फिर शाम हो जाती है, फिर सवेरा! फिर शाम! इसी प्रकार से हम चलते जा रहे हैं! हमें इसे ही समझना है। हमारा जन्म होता है, फिर बचपन शुरू हो जाता है, फिर किशोरावस्था और फिर जवानी और उसके बाद बुढ़ापा शुरू हो जाता है और उसके बाद सब जानते हैं कि हम अपनी मृत्यु का इंतजार करते हैं! और फिर वह एक दिन आकर हमें ले जाती है! फिर पुनर्जन्म होता है, इसी प्रकार यह है चक्र चलता रहता है और उसी चक्र के पहियों से हमारे जीवन की गाड़ी भी चलती रहती है! और चली जा रही है। इस सफर को कुछ महापुरुष लोग समझ लेते हैं और वे अपने आत्म स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने में लग जाते हैं और स्वाध्याय, ज्ञान, ध्यान और तपस्या करके अंततः सफल होकर अपनी आत्मा के ज्ञान को जानने में सफल होते हैं! उन्हें ही हम महापुरुष और संत कहते हैं! और फिर जो भी मनुष्य या जिज्ञासु उनकी शरण में जाकर, उनसे कुछ जानना चाहते हैं, वह उन सभी को सत्य आत्मज्ञान मार्ग के पथ पर कैसे चलना है इस दिव्य ज्ञान को समझाते हैं।
आत्मज्ञान की समझ और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी का उपदेश…मित्रों हम बात कर रहे थे कि हम सुबह से शाम तक कुछ कार्य करते रहते हैं और यह नहीं सोचते कि हमें वास्तव में क्या करना चाहिए? कभी अपने कार्यों का विश्लेषण नहीं करते, कि हमारे लिए क्या ठीक है और क्या गलत? बस यूं ही एक दूसरे को देख समझकर चलते जाते हैं। मित्रों इसी चलने को हम जीवन का सफर कहते हैं! हमें अपने इसी सफर में किस प्रकार से चलना चाहिए? जिससे कि हम सच्चे आत्म ज्ञान को प्राप्त कर सकें। हमें अपने आपको अपनी चेतना को समझना चाहिए कि जिस तत्व के द्वारा हम जीवित हैं? वह तत्व क्या है? जिसे हम आत्मा कहते हैं? इसको समझने में जिनकी रूचि है, वह ये जानना चाहते हैं कि वास्तव में सत्य क्या है? और हमें उसे कैसे प्राप्त करना चाहिए? उन्हें यह खोज हमेशा रहती है, कि हम किस प्रकार जान पाए कि सच्चा मार्ग क्या है? मित्रों, संत महापुरुष इस संसार रूपी सागर में नौका के समान हैं! जो कि हमें सहारा देकर इस संसार से पार उतार देते हैं! हमें उनकी शरण में जाना चाहिए और उन से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। हमारे अच्छे ग्रंथ भी संत महापुरुषों के समान ही हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमें उन्हें नित्य पढ़ना चाहिए। श्री योग वशिष्ठ महारामायण में भगवान श्री राम जी और ब्रह्मर्षि श्री वशिष्ठ जी का संवाद है, जिसमें उन्होंने श्री राम जी को समझाया है कि हे राम सुनो, "तुम्हें मैं मोक्ष के चार द्वार द्वारपालो के नाम बतलाता हूं, पहला है शम! दूसरा संतोष! तीसरा विचार! और चौथा सत्संग! यह चारों मोक्ष के द्वारपाल हैं, इनसे तुम्हें मित्रता करनी चाहिए, इन्हें अपने हृदय में, अपने जीवन में धारण करना चाहिए। जहां इनमें से एक भी होता है, तो बाकी के तीन भी वहां पर आ ही जाते हैं! शम का अर्थ है, मन को एकाग्र करना और उससे आत्मा का ध्यान करना! उसे आत्मा में ही लगाना, दूसरा संतोष, जो भी हमें प्रारब्ध से प्राप्त हुआ है, उसी में संतोष करना चाहिए! संतोषी व्यक्ति सदैव सुखी रहता है! हम यदि निर्धन हैं, और जो भी जीवन के साधन हमें प्राप्त हुए हैं, हमें उन्हीं में संतोष करना चाहिए, अधिक तृष्णा नहीं करनी चाहिए, इस प्रकार संतोषी व्यक्ति सदैव सुखी रहता है। तीसरा है विचार, हम कुछ भी कर रहे हैं, वह गलत है या सही है, हमारा क्या कर्तव्य है, इन सब बातों का ध्यान हमें अपने विचार रूपी मित्र के साथ हमेशा करना चाहिए। यदि यह मित्र हमारे साथ है! और हमसे कोई गलती भी हो गई है, तो हम अपने इस विचार रूपी मित्र के द्वारा उसे सुधार सकते हैं। चौथा है सत्संग! यानी सत्य का संग! सच्चे संत महापुरुषों का संग और अच्छे सद्गग्रंथों का पठन-पाठन उनका बारंबार पठन-पाठन करने से हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है और हमारा अंतःकरण शुद्ध होता चला जाता है और हम आत्मज्ञान के अधिकारी बन जाते हैं।
भगवान शंकर और माता पार्वती का संवाद.. मित्रों एक ग्रंथ है, विज्ञान भैरव तंत्र! उसमें भगवान शंकर और माता पार्वती जी के संवाद रूप में आत्म ज्ञान प्राप्ति की अनेक विधियां बतलाई गई हैं। एक सूत्र में, भगवान शंकर कहते हैं कि हे देवी, "न दुख में न सुख में" बल्कि दोनों के मध्य में अवधान को स्थिर करो! एक दूसरे सूत्र में भगवान शंकर कहते हैं कि हे कमलाक्षी! हे शुभगे! गाते हुए, देखते हुए, स्वाद लेते हुए यह बोध बना रहे कि मैं हूं और शाश्वत आवीरभूत होता है। लेकिन यह अशुद्ध के लिए कठिन है! इसका सीधा सा अर्थ है यदि हमारा अंतःकरण शुद्ध नहीं होगा तो हम इन सूत्रों पर अभ्यास करते हुए भी बहुत मुश्किल से ही सफल हो पाएंगे। इस प्रकार पहले हमें अपने अंतःकरण को शुद्ध करना होता है, तभी हम साधना के मार्ग में आगे बढ़ पाते हैं और अपनी जीवन यात्रा को सफल कर पाते हैं। अब हमें विचार करना है कि हमारा अंतःकरण अशुद्ध क्यों है? उसे क्यों अशुद्ध कहा गया है? वह कैसे शुद्ध होगा? मित्रों आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार यह संसार विनाश रूप है अर्थात इसका महाप्रलय काल में विनाश हो जाता है। हमारा यह शरीर भी विनाश रूप है, लेकिन हमारा जो अपना आत्मा है, हमारे भीतर जो हमारा आत्मा है वह अविनाशी और अजर-अमर है और हम वास्तव में वही हैं! जब हम इस ज्ञान का बारंबार अभ्यास करते हैं, तो हमारा मन संसारी कामनाओं से, वासनाओं से मुक्त होने लगता है! और हमारा ध्यान अपनी आत्मा में लगने लगता है! यनि हमारा अंतः करण धीरे-धीरे शुद्ध होने लगता है! जो कि पहले सांसारिक वासनाओं में में लगा हुआ, उनसे चिपका हुआ, अशुद्ध था और अब आत्मा के ध्यान के अभ्यास से धीरे-धीरे शुद्ध हो रहा है। भगवान शंकर द्वारा कहे गए पहले सूत्र में समझाया गया है, कि हमें अपने ध्यान को अपनी समझ को सुख और दुख दोनों के मध्य में केंद्रित रखना है! यनि हमें सुख प्राप्त हो या दुख हमें केवल उसे साक्षी भाव से ही ग्रहण करना है! कि जो कुछ हो रहा है, वह मेरा प्रारब्ध है और इंद्रियों द्वारा कर्म हो रहे हैं! मैं तो परम चैतन्य आत्मा हूं! स्थूल शरीर तो मेरा वस्त्र मात्र है, इसे मैं कभी भी उतार सकता हूं! मैं तो समस्त कार्यों का साक्षी मात्र हूं! दूसरे सूत्र में श्री शंकर जी ने समझाया कि गाते हुए, स्वाद लेते हुए, देखते हुए और किसी प्रकार का भी अनुभव करते हुए, हमें यह बोध बना रहे कि मैं हूं! यनी कि मैं वह चैतन्य तत्व हूं जो कि मेरे संपूर्ण शरीर में और सर्वत्र व्याप्त है! मेरा मन कहीं भी जा रहा है, कुछ भी कर रहा है, मैं परम चैतन्य आत्मा वहां पहले से ही मौजूद हूं! मेरे शक्ति से ही मन भी चेतन होता है! मैं तो अनंत उदय रूप परम साक्षी आत्म तत्व हूं! इसी ज्ञान का जब कोई साधक सच्चे मन से निरंतर अभ्यास करेगा तू उसे अपने सर्वव्यापक आत्मा का अनुभव होने लगेगा वह समझ पाएगा कि कर्म तो स्वभाविक ही इंद्रियों के द्वारा होते रहते हैं और मैं तो केवल साक्षी आत्मा हूं! जब इस प्रकार के ज्ञान की समझ हमारे भीतर उदय होती है, तब हम बिना किसी कामना के कार्यों को करने लगते हैं और हम तब निष्काम कर्म करने लगते हैं और हमारा अंतःकरण भी संसार से मुक्त होने लगता है और वह शुद्ध होने लगता है तब इन सब ज्ञान के वाक्यों को हमारा मन या हृदय बहुत अच्छे से धारण करता है और हमारा ध्यान भी लगने लगता है और हम इन ज्ञान सूत्रों में वर्णित स्थिति को प्राप्त करने में कामयाब हो सकते हैं। मित्रों इस लेख में इतना ही हम इसी वार्ता को यहीं से अगले लेख में भी जारी रखेंगे लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद आपका दिन शुभ हो।




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