साकार और निराकार परमात्मा का ज्ञान!
ईश्वर साकार है या निराकार? इस प्रश्न के बारे में बड़े-बड़े संतों और ज्ञानियों की राय थोड़ी अलग-अलग है। कुछ ज्ञानी जन ईश्वर को साकार मानते हैं! और कुछ ज्ञानी जन उसे निराकार मानते हैं! कुछ ज्ञानी जन ऐसे भी हैं जो ईश्वर के साकार और निराकार दोनों ही रूपों में विश्वास करते हैं! उनका मानना है कि इस संसार की रचना करने के लिए निराकार परमात्मा ही साकार रूप धारण करते हैं! और अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए, वह अनेकों नामों से साकार रूप धारण करके, अवतार धारण करते हैं! अपने परम रूप में, वह एक निराकार शक्ति हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी और महाज्ञानी भी इस पर एकमत नहीं हैं! सब के विचार थोड़े अलग-अलग हैं।
साकार क्या है? और निराकार क्या है?...अब हम कुछ विचार करते हैं, कि साकार क्या है? और निराकार क्या है? साकार जिसका आकार है ! निराकार जिसका कोई आकार नहीं है! लेकिन यह जो आकार है, वह है किसका? वह निराकार का ही तो है! जैसे मिट्टी का दिया, मिट्टी का घड़ा! यह दोनों किसके आकार हैं? इसका उत्तर है कि यह दोनों मिट्टी केआकार हैं! यनि यह दोनों मिट्टी के बड़े निराकार ढेर के एक छोटे से अंश से बने हैं ! यनि उस ढेर के एक छोटे से अंश को ही घड़े और दीपक का आकार दिया गया है अर्थात निराकार मिट्टी के बड़े ढेर ने ही अपने एक छोटे से अंश के रूप में दो घड़े और दीपक का रूप धारण किया है, लेकिन मिट्टी क्योंकि निर्जीव है! इसलिए इसे यह आकार एक चेतन कर्ता कुम्हार के द्वारा दिया गया है! कुम्हार के द्वारा उस निराकार मिट्टी का उपयोग करके, उस निराकार मिट्टी को अनेकों सुंदर घड़ों और दीपों का आकार दिया गया। और इस प्रकार से निराकार से साकार का जन्म हुआ! इस प्रकार यह साकार घड़े और दीए निराकार मिट्टी के ही हिस्से हैं! मित्रों अब हम दूसरे उदाहरण के द्वारा समझते हैं! हम सभी बिजली या विद्युत शक्ति के बारे में तो अवश्य ही जानते हैं! और इस बात को हम सभी जानते हैं, कि बिजली का कोई आकार नहीं होता! उसे देख नहीं सकते! केवल उसके प्रभावों को ही देख सकते हो! बिजली के अनगिनत प्रभावों को हम अपने जीवन में नित्य प्रति देखते रहते हैं । एक कमरे में बहुत सारे यंत्र लगे हुए हैं! जिनमें बल्ब है, टेलीविजन है, पंखा है, हीटर है, कंप्यूटर है, यह सभी बिजली की शक्ति से ही चलते हैं! बिजली जिस भी यंत्र के भीतर जाती है, उसे चलायमान कर देती है! एक प्रकार से उसे जीवित कर देती है! फिर वह यंत्र अपना कार्य करने लगता है। जब बिजली बल्ब के भीतर जाती है तो उससे प्रकाश निकलने लगता है! जब बिजली पंखे के भीतर जाती है, तो पंखा घूमने लगता है! जब बिजली हीटर में जाती है, तो वहां से गर्मी निकलने लगती है! बिना बिजली के यह सभी यंत्र बेकार हैं! मृतक समान हैं! यह सभी बिजली की शक्ति से ही चलते हैं! यानी बिजली ही इनका जीवन है!इनकी अपनी कोई शक्ति नहीं है! इसी प्रकार से हम समझ सकते हैं, कि एक निराकार परम चैतन्य अनंत शक्ति! जो कि सब जगह व्यापक है! जिसे हम आत्मा कहें या परमात्मा कहें या अनंत आकाश! वही इस संपूर्ण ब्रह्मांड में है और उसे जीवन भी प्रदान करती है! वही इसका कारण है, कार्य है, और परम कर्ता भी है! उसी परम चैतन्य सत्ता की कृपा से ही, समस्त विश्व गतिमान होता है! अनंत जीवरूपी पुतलियां बन जाती हैं! जोकि आपस में वाद-विवाद और बहस भी करती हैं! इस अनंत वीरान पड़े हुए! इस वितान या अनंत आकाश के जंगल में! मंगल पैदा कर देती है! और फिर बड़े ही विस्तार के साथ यह सृष्टि! कारण और कार्य के सहित चलने लगती है। यह जो आकार हमें दिखाई दे रहे हैं, वह सब वास्तव में उस निराकार का ही हिस्सा हैं! असली सत्ता निराकार की है! निराकार तो सदैव से है ही! लेकिन लीला तो आकार के द्वारा ही होती है! निराकार अनंत विस्तीर्ण है! वह इतना विराट है! कि उसका कोई मापदंड हो ही नहीं सकता! यह सारी सृष्टि उसके भीतर ही बन रही है! उस निराकार की परम शक्ति के द्वारा ही, अनंत आकार उत्पन्न हो गए हैं! उनका कहीं भी अंत नहीं है! इतना विराट कार्य करने के बाद भी, वह परम शक्ति अकर्ता ही है! यनि वह कुछ नहीं करती! केवल उसके सकाश या प्रभाव से ही इस विराट सृष्टि का जन्म और विनाश! समुंदर की जल की बड़ी-बड़ी लहरों के बनने और मिटने के समान सदैव ही होता रहता है । वह निराकार परम चैतन्य शक्ति तो इस अनंत सृष्टि के भीतर केवल दर्शक मात्र है! उस निराकार अनंत परमेश्वर के द्वारा अनंत जीवो का प्रादुर्भाव होता है, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश मुख्य हैं! जो इस विराट विश्व व्यापार को संभालने वाली या चलाने वाली बड़ी सत्ताएं हैं! जिनका वर्णन वेदों और हमारे पुराण ग्रंथों में भी है! और यही बड़ी-बड़ी शक्तियां! इस संपूर्ण ब्रह्मांड की सत्ता को संभाल रही हैं!
एक मनमोहक और ज्ञानवर्धक कहानी…निराकार और साकार का ज्ञान बहुत ही अद्भुत और रहस्यमय और दिव्य है! किसी एक कहानी के माध्यम से समझते हैं! संत नामदेव जी, श्री विष्णु भगवान जी के विठ्ठल स्वरूप के परम भक्त थे! और उनसे उनकी वार्ता बिल्कुल दोस्तों की भांति बैठकर होती थी। एक बार चर्चा के दौरान नामदेव जी ने उनसे पूछा, कि भगवान आप सब देवताओं में बड़े हैं! क्या आप से आगे भी कोई रास्ता होता या जाता है? श्री विट्ठल जी ने कहा, नामदेव! इसका उत्तर तो तुम्हें संत ही दे सकते हैं! और फिर उन्होंने नामदेव को एक संत का पता बताया, और कहा कि तुम वहां जाओ, वह तुम्हें इस निराकार दिव्य ज्ञान के बारे में समझाएंगे। नामदेव जी उन संतजी के स्थान पर पहुंचे, वहां जाकर और उन्हें देखकर उन्हें बहुत ही गुस्सा आया और आश्चर्य भी हुआ! उन्होंने देखा वह संत जी आराम कर रहे थे! और उन्होंने अपने पैर शिवलिंग के ऊपर रखे हुए थे! उन्होंने सोचा, कि यह व्यक्ति संत कैसे हो सकता है? जिसने भगवान के पवित्र श्री विग्रह के ऊपर ही चरण रखे हुए है! क्योंकि स्वयं विट्ठल भगवान ने ही नामदेव को इन्हीं संत के पास ज्ञान प्राप्ति के लिए भेजा था, यह सोचकर नामदेव जी ने उन्हें पुकारा! तो संत जी ने कहा, 'आओ नामदेव आओ' तुम्हें बिट्ठल ने भेजा है ना! नामदेव को थोड़ा आश्चर्य हुआ! कि यह कैसे जान गए, कि मुझे विठ्ठल ने भेजा है। नामदेव जी ने गुस्से में कहा, कि जी हां भेजा तो है ,परंतु मैं समझता हूं कि, आपको संत कैसे कहूं? आपको तो इतना भी होश नहीं है, के पैरों को कहां रखा जाए! आप तो भगवान का अपमान कर रहे हैं !संत जी मुस्कुराए !और उन्होंने नामदेव जी से कहा, कि नामदेव तुम कृपा करके, एक काम करो, मेरे पैरों को वहां कर दो, जहां भगवान नहीं है! नामदेव ने उनके पैरों को पकड़ा और घुमा कर दूसरी जगह रख दिया लेकिन आश्चर्य वहां भी एक शिवलिंग बन गया था और फिर नामदेव जहां भी संत जी के पैरों को रखते , वहीं पर शिवलिंग बन जाता था! तब तो वह आश्चर्य में पड़ गए! तो उनकी जिज्ञासा को शांत करते हुए, संत जी ने समझाया, कि नामदेव परमात्मा सर्वव्यापक है! सब जगह हैं! ऐसा कोई कण या स्थान नहीं है! जहां परमात्मा नहीं हैं! नामदेव जी परमात्मा के असीम स्वरूप के बारे में समझ गए थे।
निराकार और साकार गुरु.. निराकार परमात्मा का दिव्य ज्ञान समझाने वाले गुरु! निराकार महागुरु की श्रेणी में आते हैं। साकार गुरु जन तो हमारे जीवन में बहुत सारे हो सकते हैं! जिन्होंने हमें हमारे जीवन में कुछ भी सिखाया, हम उन्हें गुरु ही कहते हैं। सर्वप्रथम हमारे माता-पिता जिनके द्वारा हम जीवन की प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते हैं वह भी हमारे गुरु ही होते हैं और उसके बाद हमारे विद्यालयों के अध्यापक जन्, आसपास पंडित जन और हमें किसी भी देवता के पूजन की शिक्षा, भजन की शिक्षा, सत्संग की शिक्षा, देने वाले सभी गुरु हैं। इनका समस्त शिक्षा ज्ञान! इस साकार जगत और इसकी शक्तियों के बारे में ही होता। जैसे शिव भक्त गुरु, शिव भक्ति की! देवी भक्त गुरु, देवी भक्ति की ! विष्णु भक्त गुरु, विष्णु भक्ति की पूजा और आराधना को सिखाते हैं। इस संसारी ज्ञान और फिर योग विद्या की ज्ञान में पारंगत होकर श्रेष्ठ साधक धारणा, ध्यान और समाधि का अभ्यास करता हुआ निराकार ज्ञानी साधक! आत्मा और परमात्मा के ज्ञान की ओर बढ़ता है! तब उसे यह ज्ञान निराकार संत महापुरुषों की शरण में जाकर प्राप्त होता है। साकार ज्ञान की अपेक्षा, निराकार ज्ञानी संत का दर्जा बहुत ऊंचा होता है! ऐसे दिव्य महापुरुष सर्वत्र संपूर्ण ब्रह्मांड में और समस्त जगत के कण-कण में परमात्मा की अनुभूति करते हैं। ऐसे दिव्य संतो की शक्ति की कोई भी सीमा नहीं होती है! काशी के प्रसिद्ध संत श्री तैलंग स्वामी जी! ऐसे ही दिव्य संतों की श्रेणी में आते हैं! एक बार गंगा जी में स्नान करते हुए उन्हें दुग्धपान की इच्छा हुई तो उनकी इच्छा शक्ति से, गंगा जी का जल काफी दूर तक दूध में परिवर्तित हो गया था! और दुग्धपान करने के पश्चात फिर दोबारा से जल बन गया था!
संत ज्ञानेश्वर जी एक सच्चे संत और निराकार ज्ञानी महापुरुष थे। उनकी प्रसिद्धि काफी दूर तक फैल गई थी! उनके निवास के निकट के जंगल में, एक बड़े महायोगी स्वामी चांगदेव जी रहते थे। कहा जाता है कि उनकी उम्र लगभग 1400 वर्ष की थी! अपनी सिद्धि का प्रभाव दिखाने हेतु, एक बार वह संत ज्ञानेश्वर जी से मिलने के लिए,हाथ में सांप की चाबुक लिए हुए! एक शेर पर सवार होकर संत ज्ञानेश्वर जी से मिलने के लिए गए! जब संत ज्ञानेश्वर जी को पता चला कि महायोगी चांद देव जी उनसे मिलने के लिए, शेर पर सवार होकर आ रहे हैं !तो उस समय संत ज्ञानेश्वर जी एक मिट्टी की बनी हुई दीवार पर बैठे हुए थे, तब उन्होंने सोचा कि योगी जी का स्वागत करना चाहिए! क्योंकि वह तो शेर पर सवार होकर आ रहे हैं! और मेरे पास तो कोई वाहन भी नहीं है! तब उन्होंने उसी दीवार को चलने का आदेश दिया! कि चलो स्वामी जी की अगवानी करते हैं! तब वह दीवार ही चलने लगी, और स्वामी चांगदेव के पास पहुंच गई! जब चांगदेव ने, उस निर्जीव दीवार को ही चलते हुए देखा! तब तो उनका सारा घमंड ही चूर-चूर हो गया! और वह संत ज्ञानेश्वर जी के चरणों में गिर गए और उनके उनका शिष्य बनना स्वीकार किया।
एक और अद्भुत सुंदर कहानी… एक बार एक छोटे से गांव में, एक सत्संगी महात्मा जी आए। वह एक मंदिर में ठहरे हुए थे, वह भजन और सत्संग करते रहते थे। उसी मंदिर में एक छोटा बालक भी लगभग 13-14 साल का, वहां पर भजन सुनने आया करता था। एक दिन महात्मा जी जब भजन गायन कर रहे थे, तो वह बालक उनके भजन को सुनते हुए इतना तनमय हो गया था! कि सभी भक्तों के जाने के बाद भी उसे होश ही नहीं रहा! तो महात्मा जी ने उससे कहा अरे बालक! तुम नहीं गए! तो बालक ने चौक कर उठते हुए कहा, महात्मा जी थोड़ी नींद आ गई थी! अभी जाता हूं! तब महात्मा जी ने उस बालक से पूछा, बालक क्या तुम मुझे जानते हो? बालक ने उत्तर दिया, महाराज आप एक बहुत अच्छे सत्संगी और ज्ञानी महात्मा हैं! और आपके भजन मुझे बहुत ही अच्छे लगते हैं! जिन्हें सुनकर मैं इतना तन्मय हो जाता हूं! कि मुझे होश ही नहीं रहता! बस मैं इतना ही आपको जानता हूं! तब महात्मा जी ने उससे पूछा, बालक तुम ईश्वर या परमात्मा के बारे में क्या जानते हो? बालक ने उत्तर दिया कि महाराज ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देवी, देवता आदि भगवान के अनंत रूप हैं और हम इन्हीं में से किसी की भी पूजा करते हैं! बस मेरी इतनी ही समझ है! बालक की अवस्था छोटी थी उसने काफी हद तक उत्तर भी सही दिया था। क्योंकि हमारी हिंदू सनातन संस्कृति में इतना पूजा-पाठ का ज्ञान और संस्कार तो स्वभाविक ही परिवार से मिल जाता है। तब महात्मा जी ने कहा कि बालक तुम्हारे इस उत्तर से मुझे कोई संतोष नहीं हुआ! कोई बात नहीं, तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूं? तुम्हारा मेरे साथ क्या संबंध है? और तुम्हें मेरा गाना या भजन क्यों अच्छा लगता है? अभी तो तुम जाओ, कल फिर आना! कल मैं तुम्हें समझाऊंगा कि सच्चा ईश्वरीय ! आत्मा या परमात्मा का ज्ञान क्या होता है? अगले दिन बालक फिर आया और जब भजन-कीर्तन समाप्त हो गया, सभी चले गए थे ,उस वक्त मंदिर में कोई नहीं था। महात्मा जी ध्यान में बैठ गए और बालक के सिर पर अपने हाथ का स्पर्श किया तो बालक को ऐसा लगा कि कोई ठंडी सी ज्योति उसके शरीर में समा गई है! और उसे ऐसा लगने लगा कि, सब जगह वही है! वह जिस ओर भी देख रहा था! मच्छर को, मक्खी को, कुत्ते को, मंदिर को ,दीवार को! किसी भी और! उसे लग रहा था ,कि सब जगह वही है !तभी एक बिल्ली वहां पर दूध देखकर आ गई, उसे ऐसा लगा कि बिल्ली भी वही है! इस प्रकार कुछ देर तक उसका इस प्रकार का भाव रहा, फिर शांत हो गया ! तब महात्मा जी ने बालक को समझाया कि ईश्वर दर्शन के माने हैं! आत्मदर्शन! सर्वत्र अपने को देख पाना! यही ईश्वर दर्शन की सीढ़ी है! ऐसे ही दिव्य संत निराकार ज्ञानी महागुरु होते हैं। हमें उन्हें गुरु नहीं महागुरु ही कहना चाहिए! ज्ञान वार्ता बहुत लंबी हो सकती है! लेकिन मैं यहीं पर, अपनी वाणी को विराम देता हूं! आशा है आप समझ गए होंगे कि साकर गुरु और निराकार गुरु में क्या अंतर हो सकता है! साकार और निराकार परमात्मा का रहस्य कितना अद्भुत! और कितना रहस्यमय है!
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