खुशियों का अद्भुत संसार !

 खुशियां कहां से आती हैं?..  


बड़ा ही सुंदर और अद्भुत प्रश्न है कि यह खुशियों कहां से आती हैं? और इनका  स्त्रोत आखिर है कहां? यह खुशियां कहां से आकर हमारे मन में प्रकट होती है? चारों तरफ अद्भुत  रंगीनियों  भरा संसार है!  उसमें हमारा परिवार है, जहां हम रहते हैं, और हमेशा हर पल खुशियां बटोरने की कोशिश मैं लगे  रहते हैं। अब कुछ समझते हैं, कि खुशियां कहां से आती हैं? दोस्तों खुशियां वहां से आती हैं, जहां खुशियों का असीमित भंडार है! और वह भंडार है, हमारी आत्मा! मित्रों हमारी खुशियों के विभिन्न प्रकार हैं, जो कि हमारे भिन्न-भिन्न प्रकार के अंतःकरणों  के अनुसार होती हैं। मित्रों खुशी! किसी चीज से !अपने स्वास्थ्य से! धन से! परिवार से! देश से !धर्म से! अपने या किसी और के विचारों से, किसी से भी  मिल सकती है। लेकिन वह जब भी मिलेगी या जाएगी !  वह हमारे भीतर से या हमारे अंतः करण से ही आएगी! और  हमारा अंतःकरण  हमारी आत्मा से जुड़ा हुआ है। इसे एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं, कि जब एक मंदिर का निर्माण होता है, तो उसके मानने वाले हिंदुओं को उस  मंदिर के बनने से बहुत खुशी होती है और उससे भी ज्यादा खुशी उन भक्तों को होती है जो उस मंदिर में प्रतिष्ठित देवता को मानने वाले होते हैं। और जब कहीं  किसी मस्जिद का निर्माण होता है  तो मुस्लिम धर्म के मानने वालों को बहुत खुशि होती है!  जब कहीं गुरुद्वारा बनता है तो सिख भाइयों को खुशी होती है! इस प्रकार से हम सभी को अपनी अलग-अलग प्रकार की रुचियों  के अनुसार ही खुशियां मिलती हैं! और इन सब का जो आधार है, वह है, हमारी आत्मा या सर्वव्यापक परम चैतन्य परमात्मा! जो एक ही है! और उसकी शक्ति सभी के लिए समान है! लेकिन हम सभी के अंतःकरणों में थोड़ा-थोड़ा अंतर है या होता है इसी कारण से हमें खुशियां भी अलग-अलग कार्यों से मिलती है। एक पंडित को पूजा करने में खुशी अधिक मिलती है! एक किसान को अपनी फसलों को देखकर ज्यादा खुशी होती है! पहलवान को पहलवानी करने में ज्यादा खुशी मिलती है! इस प्रकार से हम समझ सकते हैं कि दुनिया में विभिन्न प्रकार के लोग हैं, और उनकी खुशियों या रुचियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं।

             


 आत्मा की कहानी और अंतःकरण.. इस बात को एक छोटी सी कहानी के माध्यम से समझते हैं। एक किसान की दो पुत्रियां थी जिसमें से एक की शादी एक किसान के साथ हुई थी और दूसरी पुत्री की शादी एक कुम्हार के यहां हुई थी। एक दिन वह अपनी पुत्रियों से मिलने के लिए गया। पहले वह  उस पुत्री के यहां गया  जिसकी शादी एक कुम्हार के साथ हुई थी। वह वहां पहुंचा, उसकी पुत्री अपने पिता को देख कर अत्यंत ही बहुत प्रसन्न हुई!  और बोली पिता जी नमस्ते !आपको देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूं! घर पर सब ठीक है ना! किसान ने कहा पुत्री घर पर सब ठीक है, तुम सुनाओ तुम्हारा क्या हाल है? तब उनकी पुत्री ने उत्तर दिया, 'पिताजी सब कुछ ठीक है' लेकिन मैं बहुत चिंतित हूं! कि कहीं वर्षा ना हो जाए! हमने बहुत सारे घड़े और कच्चे दिए बना रखे हैं, जिन्हें पकाने के लिए एक बहुत बड़ा अलाव भी तैयार किया हुआ  है! अगर बारिश हो गई, तो हमारा यह कार्य खराब हो जाएगा! आप ईश्वर से प्रार्थना करें कि अभी बारिश नहीं हो ! तब किसान ने  कहा कि पुत्री ठीक है, मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि अभी वर्षा न हो, और तुम्हारा कार्य ठीक प्रकार से संपन्न हो जाए! फिर वह अपनी दूसरी पुत्री जो एक किसान थी! उनके यहां पहुंचा। किसान  को देखकर उसकी पुत्री बहुत ही प्रसन्न हुई! उसने किसान को प्रणाम किया और फिर किसान उसके पास बैठकर हालचाल पूछने लगा कि  बेटी सब कुछ ठीक-ठाक है, और तुम खुश हो ना ! किसान की पुत्री  ने उत्तर दिया, 'पिताजी सब ठीक है लेकिन, वर्षा न होने कारण हमारी फसलें खराब हो रही है! आप ईश्वर से प्रार्थना करें, कि खूब वर्षा हो जाए! जिससे हमारी फसलें खराब ना  हों! वरना हम बर्बाद हो जाएंगे !किसान ने कहा, 'कि ठीक है पुत्री' और फिर वह उनसे  मिलकर अपने घर की ओर चला और सोचने लगा कि वह क्या प्रार्थना करें? कि वर्षा हो! या वर्षा ना हो! फिर उसने विचार किया, कि वह कुछ भी नहीं करता! जो होगा सो होगा, ईश्वर की इच्छा! तो मित्रों इसी प्रकार से आत्मा भी समस्त  प्राणियों के लिए बिल्कुल एक समभाव  में रहता है! उसे न किसी की खुशी से मतलब है, और ना ही किसी के गम से! वह सबके लिए बिल्कुल एक सा रहता है। लेकिन मित्रों हम सभी के अंतःकरणों में थोड़ा-थोड़ा अंतर होने के कारण हम सभी का स्वभाव भी कुछ थोड़ा अलग-अलग होता है! और हम सभी को खुशियां भी, अलग-अलग कार्यों से, विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों के अनुसार, अलग-अलग प्रकार से मिलती हैं । और यह सब हमारे अंतःकरण के द्वारा ही होता है। और अंतःकरण को शक्ति आत्मा से  मिलती है। इसी प्रकार से आत्मा रूपी किसान  की दोनों अलग-अलग अंतःकरण रूपी पुत्रियों की खुशियां भी अलग-अलग प्रकार के कार्यों से थी। एक वर्षा को चाहती थी और दूसरी वर्षा को नहीं चाहती थी। लेकिन आत्मा रूपी किसान दोनों के लिए एक सा ही है। मित्रों हमारा एक भौतिक शरीर है, और उसके भीतर एक सूक्ष्म शरीर या हमारा अंतःकरण है, जो कि इस भौतिक शरीर को गतिशील करता है और समस्त दुनिया को महसूस करता है, समझता है,और इन सब को सहारा देने वाली चलाने वाली परम शक्ति  या सर्वव्यापक परम चेतना जोकि सब जगह छाई हुई है! उसे  हम आत्मा या परमात्मा कहते हैं। और हमारा यह  अंतःकरण या हमारी आंतरिक चेतना  आत्मा की शक्ति के द्वारा ही यह सुख-दुख खुशी-गम क्रोध ईर्ष्या आदि समस्त संवेदनाओं  को महसूस करता है। 

            


    विभिन्न प्रकार की खुशियां …मित्रों! हमारा अंतःकरण जैसा होगा, उस प्रकार की ही खुशियों में हमारी रुचि होगी ।  किसी को परोपकार करने में खुशी मिलती है, किसी को दान करने में खुशी मिलती है, कोई व्यक्ति दूसरों की सहायता करने में अत्यंत प्रसन्न होता है, कोई व्यक्ति किसी को धोखा देकर, किसी का मजाक उड़ा कर, खुशी महसूस करता है! कोई किसी को जान से मार कर भी खुश होता है! जब कभी भी आपको किसी बूढ़े या कमजोर  व्यक्ति की सहायता करके सड़क पार करवाने का या किसी की भी  सहायता करने का मौका मिला हो, जैसे आपने उन्हें सड़क पार करवाई हो या कोई अन्य सहायता की हो! उस समय वह सब करके आपको एक अनजानी सी खुशी अवश्य महसूस हुई होगी! ऐसी खुशी को हम कह सकते हैं  एक निष्काम खुशी बिना किसी कामना  के लिए किया गया एक सुंदर कर्तव्य यानी एक निष्काम कर्म उससे मिलने वाली खुशी सचमुच ही आत्मा को महसूस करा देती है! ऐसा निष्काम कर्म करने के बाद एक  निष्काम सुख की अनुभूति सभी को महसूस होती है।

            


 हम जैसा अभ्यास करेंगे, वैसे ही बनते जाएंगे.. हमारा जीवन वैसा ही होता जाता है जैसे कार्यों का हम नित्य प्रति  अभ्यास करते हैं। यदि हम एक डाकू हैं और हमने दूसरों को मारने, लूटने और कत्ल करने का अभ्यास किया हुआ है तो हमारा सुबह भी वैसा ही होता जाता है और फिर  हमें वैसा ही कर्म  करके खुशी मिलती है। क्योंकि हमने अपने अंतःकरण रूपी यंत्र को उसके हिसाब से ही बना लिया है। और  आत्मा के अनंत स्रोत से हम अपने अंतःकरण के द्वारा हम वैसी ही खुशी प्राप्त कर लेते हैं जैसी हम चाहते हैं । यदि हम दूसरों की सहायता करने के कार्यों का अभ्यास करेंगे तो हमें उसी प्रकार के कार्य से खुशी मिलेगी और हमारा अंतःकरण भी वैसा ही बनता जाएगा।  किसी को देवता की पूजा करने से खुशी मिलती है! किसी को  देवी की पूजा करने से खुशी मिलती है! किसी को नमाज पढ़ने में खुशी मिलती है! तो किसी को गुरुद्वारे जाने में खुशी मिलती है, किसी को गिरजा घर जाने में खुशी मिलती है, किसी को पूजा-पाठ करने वालों की खिल्ली उड़ाने में खुशी मिलती है, किसी को हर समय धन कमाने में खुशी मिलती है, क्योंकि वह व्यक्ति हर समय धन की सोच रखता है !इस प्रकार से हमें खुशी, अपने अंतःकरण की सोच के अनुसार ही मिलती है। हमने अपने अंतःकरण को जैसा बनाया हुआ है , हमें वैसी ही खुशी मिलती है। 

         


   अच्छी संगत का प्रभाव … हम जैसे लोगों की संगत में रहेंगे, हमारा स्वभाव वैसा ही बनता जाएगा ! इसीलिए हमारे महापुरुषों ने हमें सत्कर्म करने के अभ्यास करने का उपदेश दिया है। अच्छे मार्ग पर चलने का उपदेश दिया है। यम-नियम, आसन, प्राणायाम ,प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का उपदेश दिया है ताकि  हम इन  अच्छी शिक्षाओं को ग्रहण करके उन्हें अपने जीवन में उतारे और  अपने अंतःकरण को मजबूत और सुंदर बनाएं जिससे  हमें अच्छे कार्यों से खुशी मिले! हमें दूसरों की सहायता करने से खुशी मिले। अपने अंतःकरण के निर्माण करने के तरीकों में अच्छा सत्संग, अच्छी विद्या, अच्छा पालन-पोषण, अच्छा समाज, और चरित्रवान व सच्चे  मित्रों की भी नितांत आवश्यकता रहती है। यदि हम सच्चे संतों के सानिध्य में उनकी शिक्षाओं के अनुसार चलते हुए अपने जीवन को व्यतीत करेंगे, तो हमारा हमारा अंतःकरण भी शुद्ध और अच्छा होता जाएगा, जिससे हमारे विचार भी सुंदर बनेंगे और हमारा मन अच्छे कार्यों को करने में ज्यादा लगेगा।  और उसी के अनुसार हमारा अंतःकरण भी सुंदर और मजबूत होता जाएगा। और  इसके विपरीत यदि हम बुरी संगत में पड़कर अपराधी प्रवृत्ति के लोगों के साथ अपना समय ज्यादा व्यतीत करेंगे तो उसका प्रभाव हमारे मन पर अवश्य पड़ेगा और तब हमें बुरे कार्यों को करने में ज्यादा मजा आने लगेगा और फिर हमारा अंतःकरण भी उसी के अनुसार बन  जाएगा और हमें बुरे कार्यों से ही खुशी मिलनी शुरू हो जाएगी और इस प्रकार हमारे जीवन का पतन आरंभ हो जाएगा। इसका सीधा सा अर्थ है यदि हम अच्छे लोगों के साथ रहेंगे अच्छे कार्य करेंगे तो हमारा अंतःकरण भी पवित्र व सुंदर रहेगा और यदि हम बुरे लोगों के साथ रहेंगे, बुरे कार्य करेंगे, तो हमारा अंतःकरण भी खराब और मलिन हो जाएगा। इसलिए हमें अपनी दोस्ती और अपने द्वारा किए गए कार्यों का बहुत ही सावधानी से अवलोकन करते रहना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि हम अच्छे वातावरण में अच्छे मित्रों के साथ ही अपना अधिक से अधिक समय व्यतीत करें जिससे हमारा जीवन भी सुखद और पवित्रता की ओर बढ़ सके। यही हमारे लिए अत्यंत कल्याणकारी होगा। इसलिए हमें सच्ची खुशी प्राप्त करने के लिए सदैव अच्छे  और निष्काम कर्मों को करने का  अभ्यास सदैव करते रहना चाहिए जिससे हम सत्य मार्ग की ओर हमेशा बढ़ते  रहें! 

           

    
उपसंघार… मित्रों! कल्पना करें कि बाहर सुख की चांदनी फैली हुई हो! सुहाना मौसम हो! सब जगह संगीत बरस रहा हो! और वहां भीनी-भीनी खुशबू वाली हवा  बह रही हो! और एक सुंदर समारोह चल रहा हो! और  हमारी तबीयत खराब हो तो क्या उस समय हम उस सुहाने मौसम और सुंदर समारोह का आनंद ले पाएंगे? बिल्कुल नहीं! हमें इनमें से कुछ भी अच्छा नहीं लग पाएगा क्योंकि उस समय हमारे शरीर के साथ-साथ हमारा मन या अंतःकरण भी विषाद ग्रस्त  हुआ रहता है, हमें कुछ भी अच्छा नहीं लग पाता। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हमारा अंतःकरण स्वस्थ नहीं है, तो हमारा शरीर भी उसी के हिसाब से कार्य करने लगता है और बाहर खुशियों का माहौल होने के बाद भी, हम खुशी को अच्छे प्रकार से महसूस नहीं कर पाएंगे! इसलिए हमें सदैव ही अपने शरीर और अपने अंतःकरण दोनों  को पुष्ट और स्वस्थ रखना चाहिए, ताकि हम खुशियों के असीम भंडार से जुड़े रहें।

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