मृत्यु का रहस्य !

           


   मृत्यु का रहस्य क्या है ?..मौत बड़ा ही खौफनाक शब्द है! मित्रों! इस दुनिया में कोई भी मरना नहीं चाहता! लेकिन मृत्यु तो आकर ही रहती है! सभी को कभी न कभी तो मरना ही पड़ता है! कोई कर भी क्या सकता है? क्या इससे बचने का भी कोई उपाय है ?तो मेरा जवाब है, कि अवश्य है !और फिर विचार उत्पन्न होता है कि यदि इससे बचने का कोई उपाय है, तो वह क्या है ? वह है  सच्चे  आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा! मौत एक  बहुत ही गहन और रहस्यमई चीज है ! जिसे सभी जानना चाहते हैं ! मित्रों इसके और भी अनेक उत्तर हमारे विशाल आध्यात्मिक साहित्य में उपलब्ध हैं, मित्रों इस रहस्यमई अवस्था मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का उपाय है, आत्मज्ञान! अर्थात  अपने आपका, अपनी आत्मा का ज्ञान! अपनी आत्मा का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करके हम, मृत्यु के भय से अवश्य ही मुक्त हो सकते हैं! आत्मज्ञान और इसके अभ्यास के द्वारा जब हम यह जान जाते हैं, कि हम  शरीर तो है ही नहीं ! हम तो सर्वव्यापक अजर-अमर अविनाशी, अमृत स्वरूप आत्मा है! हम शरीर नहीं हैं, हम तो एक परम चैतन्य जीवनी शक्ति हैं! जिसे हम अपनी आत्मा कहते हैं! और यह शरीर तो एक जड़ वस्तु है जो कि हमारी इस जीवनी शक्ति के द्वारा ही चालित होता है और यह हमारे लिए एक वस्त्र के समान ही है! जब हमारा यह वस्त्र कमजोर या बेकार  होकर, हमारी जीवनी शक्ति के द्वारा धारण करने लायक नहीं रहता, तब नियति या ईश्वरीय शक्ति इसे बदल देती है  जिसे हम पुनर्जन्म कहते हैं! लेकिन हमारी जीवनी शक्ति में  कोई परिवर्तन नहीं होता। हर बार नया जन्म लेने पर हमारी जीवनी शक्ति के द्वारा एक नए मन और प्राण या  कहें कि नए अंतःकरण का जन्म होता है और पुरानी जन्मों की स्मृति को हमारे अवचेतन मन में संग्रहित कर लिया जाता है जिसे हम योगाभ्यास के द्वारा या  योग शक्ति के द्वारा कभी भी देख या समझ सकते हैं कि हमने कितने जन्म लिए हैं या पिछले जन्म में हम कौन थे? मित्रों यही अखंड और परम सत्य है कि  मैं तो अविनाशी मृत्यु से परे अनंत आत्मा हूं। और जो आत्मा है, वही परमात्मा है और वही मैं हूं! मैं सर्व व्यापक सर्वत्र और  अविनाशी हूं । जब हम  इस प्रकार का ज्ञान समझ लेते हैं, और अभ्यास के द्वारा उस की अनुभूति भी प्राप्त कर लेते हैं, तब हम इस मृत्यु के भय से मुक्त होकर अमृत स्वरूप हो जाते  हैं !

          अभ्यास के द्वारा ज्ञान प्राप्ति…  मित्रों इस सत्य  के ज्ञान को जानने के लिए, समझने के लिए और उसकी अनुभूति प्राप्त करने के लिए पहले तो हमें इस आत्मज्ञान  को भली प्रकार समझना होगा, कि आत्मा क्या है? और शरीर क्या है? और वास्तविक सत्य क्या है? इस ज्ञान को हम सच्चे संतों की शरण में जाकर भली प्रकार से समझ और सीख सकते हैं। इसे अच्छी प्रकार से समझने के बाद हमें इस ज्ञान का निरंतर अभ्यास भी करना होगा तभी हम सच्चे आत्मज्ञान को प्राप्त कर  पाएंगे! इसके लिए  हमें ध्यान करना सीखना होगा! निरंतर ध्यान और अभ्यास के द्वारा ही हमें अपनी सर्वव्यापक परम चैतन्य आत्मा की अनुभूति हो पाएगी। मित्रों ध्यान की शक्ति अपूर्व है! और आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए निरंतर ध्यान करना आवश्यक है। ध्यान के द्वारा ही हम किसी भी विषय पर गहराई से उतर कर उसका विचार कर सकते हैं! उसमें डूब सकते हैं !उसे अच्छी प्रकार से समझ सकते हैं। मित्रों हमारे जीवन में ध्यान का बहुत अधिक महत्व है! ज्ञान के द्वारा ही हम अपने इस महा चंचल मन को काबू में कर सकते हैं और जब मन हमारे वश में हो जाता है, तो आत्मज्ञान प्राप्त करना हमारे लिए बहुत ही सरल हो जाता है क्योंकि यह मन या यह सांसारिक  वासना ही तो हमारी आत्मा के आगे आवरण स्वरूप है! इसके सामने से हटते ही हम अपनी आत्मा को जान पाते हैं, क्योंकि हम आत्मा तो पहले से हैं ही! सिर्फ यह सांसारिक वासना का आवरण इसके ऊपर चढ़ा हुआ था! यह सामने से हटा तो आत्मज्ञान हुआ! मित्रों इस दुनिया में सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए ध्यान से बढ़कर दूसरा कोई भी अच्छा तरीका नहीं है ! और इस ध्यान करने  का भी तो ज्ञान ही होता है! वही हमें सच्चे संतों और गुरु के द्वारा सीखना है, कि इस ध्यान में पारंगत होने की सही प्रक्रिया क्या है? इस ज्ञान को समझ कर फिर हमें इसका अभ्यास भी करना होगा । हर चीज का ज्ञान ही तो होता है! हर समस्या का समाधान भी ज्ञान के द्वारा ही होता है! इस प्रकार से आप समझ गए होंगे कि किसी भी कार्य का पहले ज्ञान या विवेक होता है, फिर उस ज्ञान के द्वारा बताए हुए रास्ते पर हमें चलना होता है जिस पर चलकर  हम अपनी  मंजिल तक पहुंच सकते हैं । यदि हम इस मौत नाम की वस्तु पर बहुत ही गहराई से विचार  करेंगे तो  आत्मज्ञान के द्वारा इस   पर  विजय भी प्राप्त कर पाएंगे । और इस आत्मज्ञान को समझने के लिए हमें अपनी आंतरिक चेतना  के ज्ञान को बहुत ही गहराई से समझना होगा  कि हम जो सोचने समझने वाली चेतना और शक्ति  हैं! वह वास्तव में क्या है ?

           हम  स्थूल शरीर मात्र  नहीं ! परम सूक्ष्म चैतन्य हैं !… मित्रों फिर हम विचार करने लगते हैं कि  हम वास्तव में क्या हैं? कौन हैं? क्या हम यह एक भौतिक शरीर मात्र हैं! या फिर कुछ और हैं! इसे कुछ इस प्रकार से समझते हैं, कि जैसे  कई बार ऐसा होता है कि हम यदि लगातार किसी एक आसन में बैठ जाए तो हमारे पैर या कोई अंग सुन्न हो जाता है! और फिर ऐसा लगता है कि हमारा वह अंग  है ही नहीं! और कई बार तो हमारा पूरा शरीर भी सुन्न हो सकता है! लेकिन हम स्वयं जागते रह सकते हैं! अपने आपको समझते रह सकते हैं !कि मैं तो हूं! लेकिन मेरा यह शरीर सो गया है, या सुन्न हो गया है! इसका अभी मुझे  आभास  नहीं हो रहा है। यनि में अलग हूं और मेरा शरीर मुझसे अलग है! और इस प्रकार से हमें अपने शरीर और अपनी चेतना के अलग-अलग होने की अनुभूति होती है! और हमारी समझ में अच्छी प्रकार से आ जाता है ,कि हम  इस शरीर से बिल्कुल अलग चेतना हैं! एक चैतन्य शक्ति हैं ! मित्रों!जब रात्रि में आप विश्राम करते हैं, तो आपका शरीर अज्ञान और सुषुप्ति कि निद्रा अवस्था में चला जाता है ! लेकिन आपका चैतन्य इतना शक्तिशाली है कि वह एक सपने की दुनिया का निर्माण करता है! और उसमें भ्रमण भी करता है। मित्रों हमें अपनी इसी चैतन्य शक्ति  के बारे में जानना है  कि वह चैतन्य शक्ति क्या है? उसका रहस्य क्या है ?हमें समझना होगा कि हम यह शरीर मात्र नहीं हैं! हमारा यह शरीर तो पंच तत्वों का बना हुआ एक पुतला है! हम कह सकते हैं, जैसे कि मानो यह हमारे शरीर की पुतला रूपी गाड़ी है! और हमारा  चैतन्य  इसमें बैठकर इसे चला रहा है! हम इससे वास्तव में अलग हैं! विलक्षण हैं! हमें इस बात को समझना और जानना है। मित्रों! जिसका जन्म होता है ,उसका मरण निश्चित है! इस बात को तो सभी जानते हैं लेकिन मरण किसका होता है, बस यही तो समझना है । और वह समझना यह है कि हमारा यह स्थूल शरीर ही नष्ट होता है लेकिन हमारी चैतन्य शक्ति,  हमारी आत्मा तो अजर-अमर अविनाशी, अखंड और सर्व व्यापक है! उसकी कभी मृत्यु नहीं होती । बस यही ज्ञान हमें गहराई से सीखना और इसे पुष्ट  करना है। क्योंकि इस शरीर का तो जन्म हुआ है, इसलिए इसका नष्ट होना भी निश्चित है! लेकिन इसके नष्ट होने पर हम नष्ट नहीं होते हैं! यही सत्य ज्ञान है! क्योंकि हम आत्मा हैं!  और यहीं से लोक परलोक! आत्मा-परमात्मा और  ईश्वरीय आध्यात्मिक ज्ञान की शुरुआत होती है। मित्रों!  हमें ध्यान अभ्यास के द्वारा आत्मध्यान मैं गहराई से प्रवेश करना होगा तभी हम   ध्यान की गहरी अवस्था में पहुंचकर  यह महसूस करेंगे कि हम एक सर्वव्यापक अनंत ज्ञान स्वरूप! अनंत सुख स्वरूप आत्मा हैं! और  मित्रों जब हम इस सच्चे आत्मज्ञान का बारंबार मनन चिंतन और निरंतर अभ्यास करते हैं तो इसके गहन अभ्यास के द्वारा सच्चे अनुभवों को प्राप्त करके सच्चे आत्मज्ञानी बन जाते  हैं! और फिर मृत्यु हमारे लिए एक खिलौना मात्र हो जाती है !क्योंकि हम जान जाते हैं कि इस शरीर के बदलने का नाम ही मृत्यु है! हमारा जो चैतन्य है वह तो अजर-अमर !अविनाशी! अखंड और अनंत हैं! उसकी कभी मृत्यु नहीं होती! और वही तो हम हैं! वही तो हमारा आत्मा है! और जो आत्मा है, वही परमात्मा है! और वही मैं हूं!

         मृत्यु का अद्भुत रहस्य !… मित्रों अब  हम भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान को मिलाकर इस मृत्यु के बारे में कुछ सामान्य चर्चा करते हैं , कि मृत्यु असल में  रहस्यमई इसलिए है, कि यह  है ही नहीं! मगर फिर भी सामने खड़ी रहती है! क्योंकि हमारी चेतना तो अजर-अमर और अविनाशी है और सिर्फ शरीर बदलने का नाम ही मृत्यु कहा जाता है। हमारा हृदय और हमारा मस्तिष्क शरीर के दो ऐसे महत्वपूर्ण अंग हैं कि जब इनमें कुछ विकार आ जाता है तो यह शरीर फिर आत्मा के लायक नहीं रहता और फिर गिर जाता है! यनि आत्मा इसे छोड़ देती है या  कह सकते हैं कि हमारा सूक्ष्म शरीर इस  में से निकल जाता है और फिर दूसरे नवीन शरीर में चला जाता है, जिसे पुनर्जन्म भी कहते हैं! और इस प्रकार हर बार एक नए  मन और नए प्राण शरीर का निर्माण होता है। असल में मृत्यु के ना होने के बारे में हम सभी जानते हैं, मगर कभी गौर नहीं करते! आप जरा ध्यान दीजिए कि आपकी उम्र कितनी भी हो, कभी ऐसा ख्याल ही किसी को भी नहीं आता, कि हम कुछ विघटित हो रहे हैं! या मरेंगे! बल्कि हमेशा हमें ऐसा लगता है, कि हम तो सदैव से हैं! और सदैव ही रहेंगे! असल  में हमारा आत्मा अंदर से जानता है कि मैं सदैव से हूं और सदैव ही रहूंगा! लेकिन बाहर दुनिया में शोर मचा हुआ है  कि मैं  मौत आ रही है!यह मर गया! वह मर गया !लेकिन यदि किसी योग विद्या के माध्यम से मरने वाले से पूछा जाए  तो उसका उत्तर होगा,  कि 'अरे! कुछ नहीं, बस शरीर गिर गया! और अब मैं यहां हूं! मैं देख रहा था, कि जब लोग  मेरे  मृत शरीर को देख कर रो रहे थे! उसे बांधकर श्मशान घाट में ले जा रहे थे! मैं साथ-साथ था! फिर उसे जला दिया गया! और अब  मैं यहां हूं ! कुछ घटनाओं में लोग मरने के बाद जब फिर से जीवित हुए, तो उन्होंने बताया कि उसके स्थूल शरीर को जलाने के लिए अर्थी बनाई जा  रही थी! और वह  अपने स्थूल शरीर को, अपने संबंधियों को, और सारे भौतिक परिवेश को देख रहा था! और फिर मैं परलोक में गया, वहां पता लगा कि अभी तो मेरे  मरने का समय ही नहीं आया है और फिर उन्होंने   मुझे वापस इस भौतिक जगत में भेज दिया! क्योंकि मेरी मृत्यु अभी नहीं थी! यानी अभी मेरा परलोक गमन नहीं होना था! इस प्रकार से अब हम जान चुके हैं कि इस शरीर के गिरने  को या कहें कि आत्मा के धारण करने के लायक नहीं रहने को ही मृत्यु कहा गया है। मित्रों आप जरा बारीकी से ध्यान दीजिए और समझिए  कि आपकी चाहे कितनी भी उम्र हो, कभी आपको एक पल के लिए भी यह नहीं लगा  होगा कि मैं कभी मरूंगा! और यही तो सत्य है  कि आप और हम सभी आत्माएं हैं! और अजर-अमर हैं! शास्त्रों में कहा भी है कि 'ईश्वर अंश जीव अविनाशी' यानी आत्मा ईश्वर का अंश है! कभी मरती नहीं! लेकिन फिर भी मृत्यु बहुत ही मशहूर है, इतनी कि है नहीं फिर भी है! इसीलिए तो  रहस्यमय भी है! या कही जाती है। इसीलिए तो मृत्यु मुस्कुराकर कहती है! कि देखो मैं हूं तो नहीं! मगर फिर भी हूं! यही तो मेरा अद्भुत रहस्य है!

उपसंघार… मित्रों हमें योगविद्या को सीखने का प्रयास अवश्य ही करना चाहिए,  और सच्चे मन और लगन  से उसका अभ्यास भी करना चाहिए! जिससे हम योगाभ्यास के द्वारा, धारणा, ध्यान और समाधि का प्रयोग करते हुए  अपनी आत्मा के ज्ञान को प्राप्त कर पाएं ! और फिर सच्चे आत्मज्ञान के द्वारा हम मृत्यु पर विजय भी प्राप्त कर सकते हैं । हमारे हिंदू धर्म या कहें  कि सनातन धर्म में अध्यात्म के विषय में एक बहुत ही विशाल और अद्भुत !दिव्य साहित्य उपलब्ध है ! जिसमें आत्मा, परमात्मा, ईश्वर और जीव के बारे में बहुत ही गहनता  और बारीकी से विचार किया गया है। हमें अपने प्राचीन धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन भी अवश्य करना चाहिए! जिनमें श्रीमद्भागवत गीता, योग वशिष्ठ, उपनिषद और पुराण साहित्य आदि हैं।


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