साधु, साधक, सिद्ध, संत और शैतान
साधु, साधक, सिद्ध, संत और शैतान..
इन पांचों की राशि तो एक ही होती है परंतु इन सब का स्वभाव और कार्य करने के तरीके अलग-अलग होते हैं। जिनमें से साधु एक परोपकारी प्रवृत्ति के व्यक्ति होते हैं और साधक एक किसी भी साधना में निश्चित समय के लिए वह चाहे तंत्र मंत्र या वैज्ञानिक जो भी हो उसमें क्रियाशील व्यक्ति को कहा जाता है, जो भी उसने कोई अपनी साधना का लक्ष्य बनाया होता है, उसकी प्राप्ति के लिए, वह अपना उद्यम करता रहता है और साधक कहलाता है। अपनी साधना में पूर्ण होने पर, योग और तंत्र की भाषा में, वह सिद्ध कहलाता है। और संत वह महापुरुष होते हैं, जो संसार से पार हो चुके होते हैं। वह ज्ञान की उस अंतिम अवस्था पर पहुंच चुके होते हैं जहां और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता। और शैतान जैसा कि नाम में ही छुपा है एक शरारती आत्मा या शक्ति और हमारा अपना मन भी जो कि सही गलत का विचार न करके किसी भी कार्य को करना और करवाना, इस प्रकार हमारा मन भी शैतानी हो सकता है। इस लेख में हम इन सब के बारे में ही कुछ चर्चा करेंगे ।
साधुओं के विभिन्न रूप… मित्रों इस संसार में अनेक प्रकार के व्यक्तियों में, कुछ लोग जो साधु प्रवृत्ति के होते हैं, वह बहुत ही सीधे-साधे और दूसरों का सदैव भला चाहने वाले, सदैव परोपकार करने वाले और बहुत ही नम्र प्रवृत्ति के होते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में हों, चाहे वह गृहस्थी में हों, चाहे सन्यासी हों, चाहे तांत्रिक हों, चाहे वह किसी भी सरकारी पद पर कार्यरत कर्मचारियों में हों, इंजीनियर या कोई ऑफिसर या किसी भी पद पर हों, वह कोई मंत्री, मुख्यमंत्री, चाहे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी हो सकते हैं, वे सदैव ही दूसरों के काम आने वाले, उनकी समस्याओं को गहरे दिल से सुनने वाले और उनका समाधान निकालने वाले होते हैं, ऐसे लोग अपना थोड़ा नुकसान करके भी दूसरों के काम आते हैं, ऐसी प्रवृत्ति होने के कारण कुछ लोग उन्हें मूर्ख भी बना सकते हैं। क्योंकि उनमें दया की भावना और दूसरों के छोटे-मोटे अपराधों को क्षमा करने की भावना भी काफी ज्यादा होती है। एक छोटी सी कहानी मैंने भी सुनी थी! एक साधु प्रवृत्ति के व्यक्ति नदी में स्नान कर रहे थे, उस नदी में कहीं से बहता हुआ एक बिच्छू डूबता जा रहा था उन्होंने उसे बचाने के लिए उसे अपने हाथ से बाहर निकाला तो बिच्छू ने डंक मार दिया लेकिन उन्होंने उसे बाहर निकाल कर जमीन पर रख दिया तब उनसे उनके मित्र ने पूछा तुम इस बिच्छू को बाहर क्यों निकाल रहे थे? जबकि वह तुम्हें ही काट भी रहा था, तुम जानते भी थे, कि यह तुम्हें काट सकता है फिर भी तुम उसकी जान बचाने में लगे हुए थे। उन्होंने एक छोटा सा जवाब दिया कि यदि बिच्छू का स्वभाव तो काटना है और जब वह अपने स्वभाव को नहीं छोड़ सकता तो मैं भी अपने स्वभाव को कैसे छोड़ दूं। दोस्तों साधु ऐसी ही होते हैं।
अनेक प्रकार के विचित्र साधक!... किसी भी शक्ति को प्राप्त करने हेतु, कुछ नियमों को स्वीकार कर उसके अनुसार दिन-रात उसमें लगे रहना, चाहे वह साधना योग की हो या किसी तंत्र मार्ग की हो, वे अपनी जान की परवाह किए बगैर उसमें दिन-रात लगे रहते हैं! कि मुझे किसी प्रकार कुछ योग या तंत्र की विशेष शक्ति प्राप्त हो जाए! ऐसी कामना में लगे हुए व्यक्ति साधक कहे जाते हैं। इनमें से कुछ साधक तो अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी दूसरे की जान लेने से भी नहीं चूकते। इसी विषय में एक छोटी सी कहानी है जो एक महात्मा जी ने अपनी जीवनी में लिखी थी कि एक बार जब वह घर से साधना हेतु जंगल में भाग आए थे वहां उन्हें एक साधक मिले, वह उनके साथ रहने लगे। एक दिन उन्हें उन्होंने अर्धरात्रि अमावस्या को एक साधना का आयोजन किया और उन्होंने एक नदी में बहते हुए मुर्दे को बाहर निकाला और फिर उसको साफ करके सीधा खड़ा किया फिर उसके हाथ में एक तलवार को पकड़ा दिया और विधि विधान से उसका पूजन किया फिर उस साधक ने महात्मा जी को समझाया कि मैं सामने ही मंत्र जाप कर रहा हूं! और यदि कोई चमत्कार होता है तो तुम बिल्कुल नहीं डरना! कुछ नहीं होगा और उन्होंने एक सूत का धागा जो कि उस मुर्दे के पास ही एक कील से बंधा हुआ था, उसे मेरे हाथ से बांध दिया और मुझे मुर्दे की तरफ से पीठ करके खड़ा कर दिया और समझाया कि देखो तुम पीछे बिल्कुल नहीं देखना। इस साधना के पूरा होने के बाद मुझे एक रहस्यमई शक्ति प्राप्त होगी। उसके बाद मैं तुम्हें भी अनेक साधनाएं करवाऊंगा, जिससे तुम्हें बी अनेक तांत्रिक शक्तियां प्राप्त हो जाएंगी! ऐसा कहकर वह मंत्र जाप में लीन हो गए, उनकी आंखें बंद थी। महात्मा जी को उन पर पूरा विश्वास हो चुका था! इसलिए वह धागे को पकड़कर और मुर्दे की तरफ पीठ करके खड़े हो गए, उनके सामने ही वह साधक जाप कर रहे थे उनकी आंखें भी बंद थी! वे सामने उन्हें देख रहे थे ! अचानक पीछे से खटपट की आवाज आने लगी! महात्मा जी अपने आप को रोक नहीं सके, उन्होंने पीछे मुड़कर थोड़ा देख ही लिया उन्होंने देखा कि मुर्दा तलवार चलाता हुआ धीरे-धीरे धागे के साथ-साथ उनकी तरफ ही चलता आ रहा है! उनके मन में अत्यंत भय समा गया और उन्होंने सोचा कि यह तो मेरी जान भी ले सकता है ऐसा सोच कर उन्होंने तत्काल धागा छोड़ा और अत्यंत तीव्रता से भागते हुए नदी पार कर दूसरी तरफ पहुंच गए और भागते भागते रात्रि में ही काफी दूर निकल गए फिर कभी मुड़ कर नहीं देखा कि वहां क्या हुआ था। कभी किसी को अच्छे साधक भी मिल जाते हैं ऐसे साधक अपने पास आने वाले की कुछ सहायता भी कर देते हैं।
सिद्ध पुरुष कौन होते हैं!... जब किसी भी व्यक्ति, या सन्यासी किसी को कुछ भी आलौकिक शक्ति प्राप्त हो जाती है! तो उसे सभी लोग सिद्ध पुरुष कहते हैं। वास्तव में तो सच्चा सिद्ध पुरुष आत्मज्ञानी ही होता है। लेकिन इस आम संसार में कुछ भी अद्भुत शक्ति किसी भी व्यक्ति को यदि प्राप्त है तो सभी उसे सिद्ध पुरुष ही कहते हैं। अघोरी बाबा कीनाराम जी घूमते हुए एक गांव से गुजर रहे थे कि अचानक उन्हें एक बुढ़िया के रोने की आवाज दी तो उन्होंने वहां जाकर देखा कि एक मात्र 10 12 साल के बच्चे को दो बड़े व्यक्तियों ने पकड़ रखा है और वे उसे उससे लगान न देने के बदले कोड़े मारने की तैयारी कर रहे हैं। उसकी मां वह बुढ़िया उनसे बार-बार दया की गुजारिश कर रही है और सामने एक बड़ी कुर्सी पर जमींदार बैठा है। बाबा ने जमींदार से उस बालक को छोड़ देने का अनुरोध किया तो जमींदार ने उनकी कुछ नहीं सुनी और कहा बाबा चलो आगे अपना काम देखो! बाबा किनाराम जी हंसे और सामने ही पालथी मारकर बैठ गए! जमींदार ने इशारा किया और जल्लाद ने पहला कोड़ा खींचकर बालक पर चलाया परंतु आश्चर्य कोड़े लगने का दर्द बच्चे को नहीं जमीदार को हुआ और जमींदार जोर से चिल्लाया अरे मर गया, मना करते करते भी दूसरा कूड़ा जब बालक पर चल ही गया तो जमींदार कोड़े की मार के दर्द से छटपटा कर नीचे गिर पड़ा! सभी चौक गए थे! जमींदार बाबा के चरणों पर गिर पड़ा और दया की भीख मांगने लगा! बाबा हंसे और बोले गरीबों पर दया करनी चाहिए! फिर बुढ़िया से बोले लो अम्मा तुम्हारा बालक सुरक्षित है। बुढ़िया ने बाबाजी को प्रणाम कर विनती की बाबाजी मैं इसे आपके चरणों में ही अर्पण करती हूं! आप इसे अपने शिष्य के रूप में कृपया स्वीकार करें! बाबा ने बहुत समझाया कि उन्हें ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन उनके बार-बार विनय करने पर उन्होंने उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया और फिर वह बालक उनके शिष्य के रूप में आजीवन उनकी सेवा में रहा। भारत के इतिहास में संत ज्ञानेश्वर जी एक महान संत के रूप में अवतरित हुए थे। उनका जन्म महाराष्ट्र में, में 1275 ईस्वी में आपेगांव में अष्टमी को हुआ था। संत ज्ञानेश्वर जी एक महान आत्मज्ञानी संत थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेकों चमत्कार भी किए थे। उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी। उस समय वहां एक महान साधक और सिद्ध पुरुष चांगदेव भी रहते थे, जिनकी उम्र हजार वर्ष से भी ऊपर कही जाती थी, उनके हजारों शिष्य थे। वह संत ज्ञानेश्वर जी को अपनी सिद्धि का प्रभाव दिखाने के लिए एक शेर पर सवार होकर और सर्प की लगाम लेकर अपने शिष्यों के साथ संत ज्ञानेश्वर से मिलने चले, जब संत जी को ज्ञात हुआ कि चांगदेव उनसे मिलने आ रहे हैं और वह भी शेर पर सवार होकर उस समय संत जी एक मिट्टी के चबूतरे के ऊपर अपनी बहन के साथ बैठे हुए थे। चांगदेव के घमंड को दूर करने के लिए उन्होंने उस चबूतरे को ही चलने का आदेश दिया और तत्काल ही वह मिट्टी का चबूतरा ही तेजी से से चांगदेव के स्वागत के लिए चलने लगा। जब चांद देव ने देखा कि यह मिट्टी का निर्जीव चबूतरा ही संत जी का वाहन बनकर चलने लगा है तो चांगदेव दंग रह गए! उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ! और वह उनके चरणों में गिर पड़े! वह जान गए थे कि संत ज्ञानेश्वर जी उम्र में बहुत छोटे हैं लेकिन ज्ञान में उनसे कहीं बहुत आगे हैं। मुगल बादशाह अकबर के समय में संत तुलसीदास जी की ख्याति फैल चुकी थी। अकबर ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें कैद कर लिया, उसका परिणाम हुआ कि उनके महल पर चारों तरफ बंदर ही बंदर आ गए और उन्होंने पूरे महल को घेर लिया! तब अकबर ने घबराकर बीरबल से पूछा, कि यह बंदर कहां से आ रहे हैं तब बीरबल ने समझाया कि महाराज श्री तुलसीदास जी, श्री हनुमान जी के परम भक्त हैं! यह उसी का परिणाम है आप आप इन से तुरंत क्षमा मांगिए और रिहा कीजिए। तब अकबर ने उनसे अपनी गलती की क्षमा मांगी और उन्हें तुरंत भेंट देकर रिहा कर दिया था।
संतों की सर्वोच्च महिमा!... मित्रों संतो की महिमा सिद्धि से कहीं आगे होती है! मशहूर संत नामदेव जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे, वह उनसे सीधा सीधा वार्तालाप करते रहते थे। उन्होंने एक बार श्री भगवान से यह प्रश्न किया, कि भगवान आप सबसे बड़े कहे जाते हैं! क्या आप से भी आगे कोई रास्ता होता है? श्रीहरि मुस्कुराए! और कहने लगे कि नामदेव इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें संतो के चरणों में ही मिलेगा और फिर उन्होंने नामदेव को एक संत के बारे में बताया और समझाया और कहा कि तुम वहां पर उनसे मिल कर आओ वह तुम्हें बहुत अच्छी तरह समझाएंगे! नामदेव अगले दिवस ढूंढते हुए उन संत के पास पहुंचे! उन्होंने देखा कि अरे यह क्या?यह कैसे संत हैं! इन्होंने तो शिवलिंग के ऊपर ही पैर रखा हुआ है! नामदेव ने ऐसा देखकर गुस्से में कहा कि महाराज आप यह क्या कर रहे हैं? शिवलिंग के ऊपर पैर! आप तो एक संत हैं, एक साधु हैं! आपको यह सब शोभा नहीं देता! संत जी ने कहा नामदेव तुम्हें विठ्ठल श्री विष्णु जी ने भेजा है! नामदेव को आश्चर्य हुआ! संत जी ने कहा नामदेव तुम मेरे चरणों को वहां कर दो जहां शिवलिंग नहीं है नामदेव ने उनके चरणों को पकड़ा और दूसरी तरफ रखा! तत्काल वहां भी शिवलिंग दिखाई देने लगा! वह जहां भी उनके चरणों को रखते! वहीं शिवलिंग दिख रहे थे! संत जी मुस्कुराए! उन्होंने समझाया कि नामदेव समझो परमात्मा सर्वत्र हैं! सर्वव्यापक हैं! कोई जगह ऐसी नहीं है! जहां परमात्मा नहीं है! हम सभी परमात्मा के हमारे भीतर ही हैं! और हम सब भी वही हैं! कुछ भी ऊंचा नीचा नहीं है! नामदेव जी को अब समझ आया और उन्हें इस प्रकार निराकार परमेश्वर का ज्ञान हुआ। इस प्रकार मित्रों अब आप समझ गए होंगे कि इस संसार में संत सबसे उत्तम श्रेणी के महापुरुष होते हैं जिन्हें अपने भीतर ही परमात्मा का साक्षात्कार हो चुका है! वह तो सर्वत्र परमात्मा का दर्शन करते हैं! उन्हें पूर्ण ज्ञान हो चुका है! वह इस बोध को पा चुके हैं! कि जो आत्मा है वही परमात्मा है और वही उनका स्वयं का चैतन्य भी है! मित्रों उनकी शक्ति की कोई सीमा नहीं होती।
शैतान क्या है? कहां है? और कौन है?...दोस्तों अब शैतान की भी कुछ बात कर लेते हैं! कि यह शैतान क्या है? वास्तव में तो शैतान हमारा मन भी है! जो कि हमेशा ही वासना के सागर में डूबा रहता है, और हमेशा ही इंद्रिय सुखों की प्राप्ति के लिए योजना बनाता रहता है! धन और संसार के कार्यों के तानों बानो को बुनने में हमेशा लगा रहता है। और मित्रों शैतान एक विशेष प्रकार की आत्मा को भी कहते हैं! हम उसे निम्न श्रेणी की तामसिक शक्ति कह सकते हैं! जैसे खबीस, कर्ण पिशाचिनी, वेताल, भूत प्रेत जिन्नात आदि। इन शक्तियों में अच्छे बुरे का विवेक कम होता है लेकिन यह सब भी साधकों के कार्य करती हैं। कुछ निम्न स्तर के साधक इन्हें खुश करके या इनकी सिद्धि करके अपनी सांसारिक वासनाओं की इच्छापूर्ति करते हैं। लेकिन ऐसी साधकों का परलोक अच्छा नहीं रहता है! अंत काल में उनकी गति भी अच्छी नहीं होती! श्री गीता जी में भी भगवान ने समझाया है कि हे अर्जुन! जो जिस शक्ति का पूजन करता है! अंत में उसी को प्राप्त होता है! भूतों को पूजने वाले भूतों को! और देवताओं के पूजने वाले देवताओं को! और भगवान को पूजने वाले भगवान को ही प्राप्त होते हैं! और आत्म ध्यान में लगे हुए साधक तो परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। तो मित्रों हमें ऐसी शक्तियों से बचना चाहिए और शैतान के बजाय सात्विक शक्तियों की आराधना करनी चाहिए जैसे हनुमान जी दुर्गा जी काली जी गणेश जी यह सभी शक्तियां हमें अच्छे मार्ग पर ही ले जाती हैं। दोस्तों ध्यान रहे कि शैतान आत्माओं में ही नहीं! मनुष्यों में भी होते हैं! कुछ मनुष्य इतने दुष्ट स्वभाव के होते हैं! कि उन्हें शैतान कहना ही उचित होता है। वह किसी का भी, किसी प्रकार से भी, अहित करने, झूठ बोलने और कुछ भी करने से कभी नहीं चूकते! चाहे कुछ भी हो जाए, ऐसे लोग अपनी दुष्टता कभी नहीं छोड़ते, ऐसे लोगों से हमें बच कर रहना चाहिए। ऐसी मनुष्य हमें सभी रूपों में मिल सकते हैं! जैसे साधुओं के रूप में! धर्मांध आतंकवादियों के रूप में! दुष्ट तांत्रिकों के रूप में! अनेक रूपों में ऐसे लोग हमें मिलते रहते हैं, और कुछ लोग तो अब जेल में भी पहुंच गए हैं और समय-समय पर जाते रहते हैं । जो धर्म के नाम पर अनाचार में लगे रहते हैं, हमें ऐसी ढोंगी बाबाओं से सावधान रहना चाहिए और अपने विवेक की आंखों को खोलकर ध्यान से देखना चाहिए कि वास्तव में हम जिस व्यक्ति को साधु समझ रहे हैं वह शैतान तो नहीं है।
उपसंहार… मित्रों! साधु और साधक तो हमें जीवन में अनेक बार मिलते रहते हैं! यदि हम अपना आचरण अच्छा रखेंगे, तो हमारा मन भी एक साधु के जैसा ही हो जाएगा! और हम अपने विवेक को ध्यान में रखते हुए एक अच्छे गुरु की तलाश करेंगे, जो कि हमें साधनाएं करवा सके, जिससे कि हम एक साधक भी बन सकें और जीवन में कुछ प्राप्त कर सकें। सिद्ध और संतों के दर्शन भी हमें कभी मिलते ही रहेंगे! यदि हमारे मन में उनसे मिलने की सच्ची प्यास है! और यदि हमें आत्मज्ञान पाने की सच्ची अभिलाषा है! तो हमारा प्रयास अवश्य ही सफल होगा। मित्रों मैं भी एक साधारण मनुष्य ही हूं! कोई विशेष साधक या सिद्ध नहीं! कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूं, आशा है आपको पसंद आएगा और आपके कुछ भी काम आएगा, तो मुझे अत्यंत खुशी होगी! लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद! आपका दिन शुभ हो!




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