जीवन दर्शन और ज्ञान

 




             दोस्तों जीवन में क्या जरूरी है और क्या नहीं? लेकिन एक चीज बहुत जरूरी है और वह है खुशी! और उसके लिए जरूरी है कि हम अपना सर्वोत्तम प्रयास करें, ऐसा भी आवश्यक नहीं है कि हम ऐसे कार्य करें जिससे कि हमें दूसरे लोग बहुत अच्छा  कहें,  हमें तो केवल अपनी रुचि के और अपने कर्तव्य को पूरा करने वाले कार्यों को ही करते रहना है। दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं हमें इस बात  से बिल्कुल भी परेशान नहीं होना है। हमें तो निर्भय और बेधड़क होकर अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाना है। हमें दूसरों  कि सोच का कैदी नहीं बनना है। हमें अपनी सोच को ही विकसित और इतना मजबूत बनाना है कि हम किसी भी स्थिति में निसंकोच  कह सकें कि कोई भी कार्य है, मैं कर सकता हूं। मैं नहीं कर सकता, ऐसा मेरे मन में ना तो कोई विचार है और ना ही कभी होगा, यही मेरा निश्चय है।  दोस्तों जब हम किसी भी कार्य को आरंभ कर  रहे हैं, उस समय मेरा पहला कदम  मेरी सोच ही है  कि मैं यह सब कर सकता हूं। मैं अपने समस्त कार्य करने में पूर्ण सक्षम हूं। दोस्तों हमें हमेशा ऐसी ही सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।

                दोस्तों हम सभी नित्य प्रति सपने देखते हैं और फिर उन्हें पूरा करने का प्रयास भी करते हैं। इस प्रकार यदि हम अपने किसी भी कार्य में हिम्मत से आगे बढ़ते रहें तो हमारे सपने भी सच हो सकते हैं, यानी कि हमने जो सोचा हम उसे पा सकते हैं, बशर्ते कि हम बिना थके, बिना रुके निरंतर  मेहनत करते रहें और किसी भी प्रकार की असफलता से निराश ना हो। मित्रों यह जीवन बहुत छोटा सा है इसलिए इसे दूसरों की सोच के अनुसार जी कर बेकार नहीं करना चाहिए। हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनना चाहिए कि मेरा अपना  क्या नजरिया है? और फिर हमें उसके अनुसार ही अपने कार्यों को करना चाहिए। मित्रों ध्यान रखो हमें अपने  जीवन मैं अपनी अंतरात्मा और अपने दिल की आवाज को  दूसरों के विचारों के शोर के भीतर नहीं दबने देना है। मैं हर प्रकार से सक्षम हूं और अपने समस्त कार्यों को समस्त कठिनाइयों को दूर करते हुए पूर्ण कर सकता हूं। यह मेरी मजबूत और सहज सोच है, और मैं अपने प्रत्येक कार्य में सफल होता जाऊंगा हमारे विचारों में ऐसी ही मजबूती होनी चाहिए तब हम किसी भी कठिन से कठिन कार्य को बड़ी ही सरलता से पूरा कर पाएंगे।

           मित्रों इस जीवन में ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं है ज्ञान यानी हमें हर प्रकार की समझ कि मैं कौन हूं? मैं शरीर हूं कि मैं आत्मा हूं? जब हम भली प्रकार यह समझ लेते हैं कि मैं अनंत परम शक्तिशाली अनंत ज्ञान और सुख का मूल स्रोत असीम आत्मा हूं तब मुझे कोई भी दुख कैसे हो सकता है? और मैं  किसी  भी कार्य से कैसे हार सकता हूं? दोस्तों हमें इसी प्रकार का दृढ़ विचार और आत्मविश्वास अपने आप में बनाना चाहिए। हमें खुद पर भरोसा करना चाहिए कि मैं कोई भी कार्य अवश्य ही कर सकता हूं। मैं किसी से किसी भी प्रकार से कम नहीं हूं । दोस्तों हमें इस बात की फिक्र कभी नहीं करनी है कि दूसरे हमारे इस चुनिंदा कार्य के प्रति क्या सोच रखते हैं? जब हम जानते हैं कि हमारा चुनाव सही है और अच्छा है और लोक कल्याण के लिए या खुद अपने लिए  भी है, तो दूसरा कोई भी हमारे कार्य के प्रति क्या सोच रहा है?  हमें उस से क्या लेना, जब हम अपना कार्य सही तरीके से कर रहे हैं, तो वह पूरा तो हो ही जाएगा, दूसरे कुछ भी सोचते  रहें,  हमें दूसरों की सोच से क्या लेना, हमें एक मस्त हाथी की तरह अपने जीवन मार्ग में आगे बढ़ते रहना चाहिए।

           मित्रों मेरी किसी भी मंजिल पर पहुंचने की या किसी भी कार्य को करने की यात्रा कितनी भी लंबी क्यों ना हो?  जब मैंने उस पर अपना पहला कदम रखा है तो फिर दूसरा फिर तीसरा भी रखा जाएगा और प्रकार आगे बढ़ते बढ़ते  मंजिल भी एक न एक दिन आ ही जाएगी।  यह कहावत तो आपने भी सुनी होगी की हिम्मत ए मर्दा और मदद ए खुदा! इसका सीधा साधा सा अर्थ है कि जब कोई भी मनुष्य जो हिम्मत करता है तो भगवान उसकी मदद करता है इसका एक दूसरा दार्शनिक अर्थ भी समझते हैं की हिम्मत ए मर्दा यनि मर्द ही हिम्मत करता है मुर्दा नहीं और मैं एक चैतन्य आत्मावान पुरुष हूं मैं शक्तिमान मर्द हूं मुर्दा नहीं। जब भी मैं किसी कार्य को करता हूं और उसमें आगे हिम्मत से बढ़ता हूं, तो मेरा अपना ही चैतन्य मेरा अपना आप यनि खुदा यनी मेरा खुद का आत्मा ही जो मेरे भीतर परमेश्वर रूप से समाया हुआ है, वह स्वयं ही यनी मेरा अपना  आत्मा ही मेरी मदद करता है। इसका सीधा सा मतलब है कि जब कोई हिम्मत से आगे बढ़ता जाता है तो उसे अपनी आत्मा से ही शक्ति मिलती जाती है और उसकी मंजिल भी आसान  होती जाती है। दोस्तों सुख और हिम्मत तो अपने भीतर से ही आते  हैं, कहीं बाहर से नहीं, क्योंकि हम एक चैतन्य आत्मा जो हैं जो कि समस्त सुखों का मूल है बस केवल आवश्यकता है उसे जानने और पहचानने की।

                दोस्तों एक छोटी सी कहानी है, जो आपने भी  सुनी होगी। एक बहुत ही धनवान व्यक्ति था। उसने अपने जीवन में बहुत सारा धन इकट्ठा किया लेकिन उसे शांति नहीं मिलती थी। वह हर समय बेचैन रहता था। उसने अपनी सारी प्रॉपर्टी बेच  दी और फिर उसे हीरो के रूप में एक पोटली में रख लिया और फिर उसने यह मशहूर किया कि जो  कोई भी उसे सच्चे सुख का अहसास कराएगा, उसे वह अपना यह सारा धन दे देगा। उसके पास बहुत से लोग आए लेकिन उसे संतुष्टि नहीं मिली उसने  मुल्ला नसरुद्दीन का बहुत नाम सुना  था कि वह एक ज्ञानी व्यक्ति है जो उसे वास्तविक सुख का अहसास करा सकता है। वह उनके गांव में पहुंचा और  वह सब से पूछता हुआ कि मुल्लाजी कहां मिलेंगे  उन्हें ढूंढता- ढूंढता  गांव की सारी गलियों में घूम रहा था। अपने सारे धन की पोटली उसने बगल में दबा रखी थी। अचानक मुल्ला पीछे से आया और उसकी पोटली को छीन कर भाग गया तब तो सेठ जोर से चिल्लाता हुआ दौड़ा अरे कोई बचाओ मेरी धन की पोटली, मेरा सारा धन छीन कर लूट कर यह व्यक्ति भाग गया है  मुल्ला नसरुद्दीन आगे आगे भाग रहा था और सेठ पीछे- पीछे दौड़ रहा था, गांव की सारी गलियों में दोनों दौड़ते रहे  और सेठ उनके पीछे भागता रहा फिर मुल्लाजी कहीं गायब हो गए और सेठ  उसके पीछे दौड़ता- दौड़ता थक गया,  और फिर हताश होकर बाहर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया और  जोर-जोर से रोने लगा, 'हाय मेरी तो सारी कमाई लुट गई, मैं बर्बाद हो गया, मैं अत्यंत दुखी हो गया हूं, मैं संसार का सबसे अधिक दुखी व्यक्ति बन गया हूं, अब मेरा क्या होगा? तभी कोई पीछे से आया और उसने उसके हाथ में उसकी धन की पोटली रख दी और फिर पूछा अब क्या हाल है? चेन और सुख मिला! उसने पोटली को देखा और अत्यंत खुशी से विस्मित होकर  बोला, 'आहा अब मैं कितना सुखी व्यक्ति हूं! मुझे असीम सुख का अहसास हो रहा है! तब  मुल्ला नसीरुद्दीन ने कहा, 'कि मैं ही तुम्हारी धन की पोटली को लेकर भाग गया था। तुम सुख की तलाश मैं भटक  रहे  थे  अब तो मिल गया, तुमने सुख को पहचान लिया कि वह  कहां से आता है? इसी बात का एहसास तुम्हें कराना था। अब तो तुम जान गए कि सुख कहां से आया? सुख तो दुख का प्रतियोगी है। जब तुमने किसी भी कारण से दुख  महसूस किया और जब वह कारण दूर हुआ तो सुख जो पहले से ही तुम्हारे अंदर  था बाहर आकर अब वह तुम्हारे  विचारों में बहने लगा है। और वह सेठ भी इस  प्रकार से ज्ञान को समझ कर आश्चर्यचकित हो गया। दोस्तों इस कहानी से हमें समझ लेना चाहिए इस सुख तो सदैव ही हमारे भीतर स्वाभाविक रूप से हर समय मौजूद रहता है, परंतु केवल हमें उसका एहसास नहीं होता और जब कोई दुख आता है और जब हम उसके कारण को दूर कर देते हैं तो सुख जो पहले से ही हमारे भीतर मौजूद था, वह बाहर आकर हमारे विचार और हमारे मन मस्तिष्क में बहने लगता है और  हम फिर से  सुख का अनुभव करने लगते हैं ।

              मित्रों सुख और दुख दोनों एक दूसरे के प्रतियोगी हैं जहां सुख आता है तो वहां  कुछ समय के बाद दुख भी अवश्य आता है। इस भौतिक संसार में, इस भौतिक शरीर में, सुख और दुख हमेशा साथ- साथ ही रहते हैं। मित्रों यदि हम ज्ञान मार्ग में थोड़ा सा और आगे बढ़े तो हमें सुख और दुख दोनों से ही दूर जाना  होगा और हमें अपने स्वयं के चैतन्य यनि स्वयं की आत्मा को पहचानना और उसका ज्ञान प्राप्त करना होगा। दोस्तों विज्ञान भैरव तंत्र नाम का एक पुराना ग्रंथ है जिसमें भगवान श्री शिव शंकर और श्री माता पार्वती जी के संवाद के रूप में इस विश्व के रहस्य  ज्ञान के बारे में उन्होंने समझाया है कि हम कैसे इस सुख और दुख की दुनिया से बाहर आकर अपने आत्मा का ज्ञान  प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने एक सूत्र में श्री माता पार्वती जी के प्रति कहा है कि हे देवी ना सुख में और न ही दुख में बल्कि दोनों के मध्य  में अपने अवधान को स्थिर करो। यानी अपने मन को सुख और दुख दोनों से ही परे जो हमारा आत्मा है उसमें लगाओ। जब हम अपने मन को एक तत्व या अपनी आत्मा में निरंतर लगाकर दृढ़ता पूर्वक ध्यान का अभ्यास  करेंगे तो हम आत्मज्ञान की दिशा में बढ़ चलेंगे और इस अभ्यास को लगातार करते रहने से हम सच्चे आत्मज्ञान को पा सकते हैं।  दोस्तों इस प्रकार हमें स्वयं को सुख और दुख दोनों से ही परे अपनी आत्मा को यनि अपने परम चैतन्य को पहचानना होगा और हमारा आत्मा जो कि सुख और दुख दोनों से ही परे परमानंद स्वरूप है, जब हम उसे जान जाते हैं, तब हम अपने परम आनंद स्वरूप में यनि स्वयं में प्रवेश कर जाते हैं! और तब यह संसार हमारे लिए मात्र एक 'खिलौना' सा हो जाता है।दोस्तों आपने इस लेख  को प्रेम से पढ़ा और समझा आप सभी का धन्यवाद। इस लेख में इतना ही, इसी ज्ञान यात्रा में हम आगे बढ़ते रहेंगे, आपका दिन शुभ हो आप स्वस्थ रहें, सदैव प्रसन्न रहें यही मेरी आप सभी के प्रति कामना है, धन्यवाद।


              




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