जीवन दर्शन और संघर्ष।
दोस्तों जीवन एक खेल है, एक फिल्मी गाना भी खूब प्रचलित रहा है जिसमें गाया गया है कि जिंदगी है खेल कोई पास कोई फेल अनाड़ी है कोई खिलाड़ी है कोई। मित्रों! जिंदगी को एक खेल की तरह जीना, जीवन जीने का एक बहुत ही सुंदर तरीका है, जब हम विचार शुरू करते हैं, तो समझ में आता है कि वास्तव में जीवन एक खेल ही तो है , लेकिन साथ ही जीवन एक संघर्ष भी है, जो कि इस खेल के साथ- साथ ही चलता है। मित्रों हमारे चारों ओर संघर्ष ही संघर्ष सदैव मौजूद है । जैसे कि जब हम आपस में खेलते हैं तो वहां भी एक संघर्ष कहे या एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ हमेशा मौजूद रहती है।
जब हम किसी प्रतियोगिता में भाग लेते हैं तो वहां भी एक संघर्ष सदैव मौजूद रहता है। हम जब अपने स्कूल, विद्यालय या कॉलेज में पढ़ाई शुरू करते हैं तो हम वहां भी अपने अज्ञान से संघर्ष करते हुए ज्ञान की ओर आगे बढ़ते हैं, लेकिन हम तब ही बढ़ पाते हैं, जब हम एक संघर्ष के दौर से यनी यूं कहें कि पढ़ाई के दौरान आने वाली मुश्किलों से गुजर कर उन्हें पार करते चले जाते हैं । हम किसी भी क्षेत्र में चले जाएं, कहीं भी चले जाएं, संघर्ष हमारे चारों ओर सदैव मौजूद रहता है। हमें कोई भी कार्य करना हो, चाहे वह सामाजिक हो या घरेलू, संघर्ष सदैव हमारे साथ चलता ही रहता है। हमारे स्वयं के मन में भी सभी जगह विचारों का भी एक संघर्ष सदैव चलता रहता है। हम नित्य प्रातः उठते हैं और शाम तक अपने कार्यों में लगे रहते हैं, तो कोई न कोई छोटा या बड़ा संघर्ष सामने आता ही रहता है। हम सड़क पर चले जा रहे हैं, हम चाहे पैदल हैं या कोई वाहन चला रहे हैं, सड़क पर चलते हुए भी वहां संघर्ष सदैव मौजूद रहता रहता है। स्कूलों में कॉलेजों में सभी जगह संघर्ष हमारे सामने मौजूद रहता है। प्रतियोगिताएं होती रहती हैं और वहां भी संघर्ष बना ही रहता है। घर में सास और बहू में अक्सर संघर्ष चलता ही रहता है। जेठानी, दुरानी में, भाइयों में, विद्यालय में सहपाठियों में, हम कहीं भी चले जाएं सभी जगह आगे बढ़ने की होड़ लगी हुई है, जो कि एक अच्छी और सुंदर बात है क्योंकि इसी आगे बढ़ने की ओर से ही तो हम प्रगति के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रहते हैं और हम मनुष्यों को इस संघर्ष की प्रतियोगिता से कुछ न कुछ नया करने की और सीखने की प्रेरणा सदैव मिलती रहती है । मैं अपने साथी से आगे कैसे निकलूं? यह मानव की एक बहुत ही गहन विशेषता है कि वह कुछ भी करके आगे बढ़ना ही चाहता है, सभी से आगे निकलना चाहता है। अपनी क्लास में वह क्लास मॉनिटर बनना चाहता है। अपने मोहल्ले या ब्लॉक में वह ब्लॉक प्रमुख बनना चाहता है जिस किसी भी सामाजिक या कैसे भी संगठन में वह कार्य करता है उसका वह संगठन मंत्री बनना चाहता है और मंत्री के बाद वह मुख्यमंत्री बनना चाहता है और मुख्यमंत्री बनने के बाद वह प्रधानमंत्री बनना चाहता है इस प्रकार से मनुष्य की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं है वह तो हर प्रकार से सर्वोच्च बनना चाहता है सदैव आगे ही बढ़ते रहना चाहता है और सर्वश्रेष्ठ कहलाना चाहता है। और ज्यादा क्या कहें वह सभी जगह कुछ खास ही होना चाहता है। वह चाहता है कि उसकी पर्सनैलिटी एक हीरो के जैसी हो वह कभी भी किसी से भी दबना नहीं चाहता। यदि किसी झगड़े में उसकी स्वयं की ही कोई गलती हो क्यों ना हो तब भी वह वहां भी जीतना ही चाहता है। वह किसी प्रकार भी शर्मिंदा नहीं होना चाहता उसे अपनी हार कभी भी पसंद नहीं है और सदैव यही हम सब की हार्दिक तमन्ना रहती है।
मित्रों इसी आगे बढ़ने की होड़ के कारण मानव आगे बढ़ता ही जा रहा है। और विज्ञान भी इसी प्रकार मनुष्यों की गहरी आकांक्षा से आगे बढ़ता और तरक्की करता जा रहा है। इस आधुनिक युग में मनुष्यों ने इस विज्ञान को इतना विकसित कर लिया है कि वह बैलगाड़ी से चलकर अब वायुयान और उससे भी आगे रॉकेट और अंतरिक्ष यान के जरिए चांद सितारों तक जा पहुंचा है और उसने उनके ऊपर अपनी विजय का झंडा भी फहरा दिया है। विज्ञान के द्वारा मनुष्य ने हजारों अविष्कार करके अपने जीवन की सुख सुविधाओं मैं महान उपलब्धि हासिल कर ली है और इस प्रकार विज्ञान के साथ खेलते- खेलते आगे बढ़ते हुए मनुष्य ने कंप्यूटर का निर्माण करके इस मानव जीवन को अत्यंत ही सरल बना दिया है और तरक्की और खोज करने के प्रयासों को भी अत्यंत सरल बना दिया है। कितनी भी कठिन गणना हो वह कंप्यूटर के द्वारा पल भर में कर सकता है। उसने कंप्यूटर में वीडियो गेम्स बनाकर उसमें एक काल्पनिक एनिमेशन की दुनिया को बना मनोरंजन और तरक्की के हजारों दरवाजों को खोल दिया है।
दोस्तों हमारा यह जीवन एक संघर्ष तो है ही लेकिन यदि हम इस संघर्ष को अपने इस जीवन मैं एक खेल की भांति शामिल कर लें तो यह संघर्ष हमारा दोस्त बन जाएगा और फिर जीवन बहुत ही सरल होता जाएगा और जब हम अपने जीवन को खेल की भावना से जिएंगे तो हमें जीवन में हार का सामना होने पर भी कभी निराशा नहीं होगी और फिर हम आगे बढ़ते हुए कर्म करते हुए उस निराशा भरे माहोल से आसानी से निकल पाएंगे और ज्यादा मेहनत करते हुए अपनी हार को भी जीत में बदल पाएंगे।मित्रों जीवन में हार या असफलता का सामना सभी को कभी न कभी करना ही पड़ता है, परंतु हमें उस हार से निराश होकर बैठ नहीं जाना चाहिए अपितु उसके बाद दुगने उत्साह से ज्यादा मेहनत करते हुए अपनी हार को जीत में बदलने की कोशिश में लगे रहना चाहिए। दोस्तों मशहूर योद्धा नेपोलियन बोनापार्ट एक बार युद्ध में हार कर निराश होकर जंगल में चला गया था। तब उसने वहां पर एक अनोखी घटना को एक मकड़ी के द्वारा किए गए प्रयास के रूप में देखा। उसने देखा की एक मकड़ी किसी जगह पर चढ़ना चाह रही थी, लेकिन वह फिसल कर बार-बार गिर जाती थी और ऐसा 1 बार 2 बार 3 बार या केवल 4 बार ही नहीं बल्कि दसियों बार हुआ, लेकिन मकड़ी ने हार नहीं मानी और वह प्रयास करती ही रही और फिर आखिर वह उस ऊंचाई तक अपने मुकाम पर धीरे-धीरे चढ़ने और पहुंचने में कामयाब हो ही गई। तब नेपोलियन ने सोचा कि यदि यदि इस छोटी सी मकड़ी ने बार-बार असफल होने के बाद भी अपने प्रयास को नहीं छोड़ा और फिर अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब हो ही गई तब मैं निराश क्यों हो रहा हूं, मैं भी अवश्य ही कामयाब हूंगा और फिर दोबारा से नेपोलियन ने अपनी फौज इकट्ठी की और दुगनी ताकत और जोश के साथ युद्ध लड़ा और विजय हासिल की।
मित्रों यदि हम जीवन में खेल भावना को गहराई से समझ कर उसे अपने प्रत्येक कार्य में शामिल कर ले तो हमारा पूरा जीवन ही एक खेल के समान होता चला जाता है और हमारा संपूर्ण जीवन सुखमय होता जाता है, जैसे कि यदि हम अपने घर में ही लें, यदि पति पत्नी दोनों ही घर के कार्य करते हुए भी उन्हें खेल जैसा समझें तो जैसे कितना आनंद बिखरने लगता है, घर में खुशियों की बहार आ जाती है, पति- पत्नी बच्चे सभी खुश रहते हैं। जैसे पति -पत्नी किसी भी कार्य को करते हुए मानो जैसे वे आपस में खेल रहे हैं, कभी बच्चों से खेल रहे हैं, तो कितना भी कठिन कार्य हो वह भी अत्यंत ही सुहाना और खुशी-खुशी होता चला जाता है।मित्रों यदि हम गौर से देखें तो हम समझ पाएंगे की यह संपूर्ण विश्व अनंत परमेश्वर का एक खेल मात्र ही तो है और उसमें हम मात्र एक पात्र हैं यदि हम अपने इस पात्र या कलाकार के रोल को भली प्रकार अच्छे से कर पाएंगे तो बहुत ही अच्छा होगा और तब हमारा समय भी बड़े ही आनंद के साथ व्यतीत होने लगेगा । जैसे यदि हम पति के स्थान पर खड़े हैं और अपने इस पति के रोल को अच्छे प्रकार से निभा रहे हैं तो हमारी इस छोटी सी दुनिया में ही एक सुंदर स्वर्ग का निर्माण हो जाएगा और हमारा अपना घर ही स्वर्ग बन जाएगा और दोस्तों यह सब कुछ खेल- खेल में ही होता चला जाता है और हमारा जीवन आनंदमय बनता चला जाता है।
इसी खेल भावना को आगे बढ़ाते हुए विद्यालयों में स्कूलों में कॉलेजों में अनेक प्रतियोगिताएं अक्सर होती रहती हैं। अनेक प्रकार की खेल प्रतियोगिताएं, अनेक प्रकार की कवि गोष्ठिया विद्यालयों में कराई जाती हैं, समय-समय पर भाषण प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं इसलिए कि हम इस अपने इस जीवन में खेल-खेल में ही आगे बढ़ाते हुए कठिन से कठिन कार्य को बहुत आसानी से करना सीख जाएं। खेलों में जैसे कबड्डी, कुश्ती, क्रिकेट, दौड़ लगाना आदि अनेक खेल तो है ही, उसके साथ ही साथ नृत्य कला, गायन विद्या, नाटक मंचन, यह सब भी एक बहुत ही अच्छे खेल के अवसर हैं। नृत्य करते हुए भी हम अपने समय को एक सुखद खेल भावना से आगे बढ़ा सकते हैं, जब हम कोई गाना गाते हैं और गाते हुए उसके भाव में डूब जाते हैं तो हमें एक असीम आत्मिक सुख की अनुभूति होने लगती है और इसी प्रकार से यह जीवन खेल ही खेल में निष्काम भावना से आगे बढ़ता जाता है। मित्रों इसी प्रकार से जब हम किसी वीणा, तबला, हारमोनियम या सितार को बजाते हुए उसमें अत्यंत गहराई से प्रवेश करते हैं, उसमें तल्लीन होते जाते हैं और उसमें डूब से जाते हैं तब हमें उसमें भी एक आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। दोस्तों यदि हम ध्यान से समझें तो हम जान पाएंगे कि जितने भी सुख हैं, वह सभी हमारे अंदर से ही आते हैं, हमारी आत्मा से ही आते हैं। इस प्रकार जब हम ज्ञान मार्ग में आगे बढ़ते हैं तो हम जान पाते हैं कि हमारे सारे सुख हमारे भीतर से ही आते हैं यनि हमारी आत्मा से ही आते हैं और हमारी आत्मा में ही अनंत सुख विद्यमान है। हमारी आत्मा ही हमारी समस्त शक्तियों और असीम आनंद का मूल स्रोत है। सभी ऋषियों-मुनियों और साधकों ने ध्यान साधना करने के बाद यही अनुभव किया है कि हमारी आत्मा ही अनंत ज्ञान दर्शन और सुख का मूल कारण है। हमारी आत्मा के भीतर अनंत ज्ञान और अनंत आनंद विद्यमान हैं और इसीलिए भी हमें अपनी आत्मा के बारे में अवश्य ही जानना चाहिए।
मित्रों यह आत्मज्ञान क्या है? यह आत्मज्ञान कैसे होता है? इस विषय में जब हम कुछ गहराई से आगे बढ़ते हैं तो हम जान पाते हैं कि यह आत्मा अनंत और सर्वत्र विद्यमान है। हमारे समस्त कार्यों में जो भी कोई कार्य होता है वह हमारी आत्मा की शक्ति से ही होता है, हमें जो भी कुछ सुख मिलता है, वह हमें अपनी आत्मा से ही मिलता है। जब हम अपने आप को केवल एक स्थूल शरीर का पुतला भर मानते हैं, और हमें अपनी आत्मा का ज्ञान नहीं होता तभी हम दुखी होते हैं। जब हम यह जान जाते हैं कि हम तू स्वयं ही एक अनंत ज्ञान और अनंत सुख की मूल स्रोत आत्मा हैं और हमारा कभी नाश नहीं होगा तब हमें दुख कैसे हो पाएगा? दोस्तों इस प्रकार का यह ज्ञान तो हमें दिव्य महापुरुषों से ही मिल सकता है, जिन्होंने इस आत्मज्ञान को प्राप्त किया हो, और स्वयं अनुभव किया हो, और जो परम ज्ञानी हों। केवल भगवा कपड़े पहनने से ही कोई व्यक्ति संत नहीं हो जाता उसके कपड़े उसकी जाति उसका शरीर कैसा भी हो उसे स्वयं की आत्मा का अनुभव होना चाहिए तभी हम उन्हें संत यानी अंतिम सत्य को जानने वाले महापुरुष कहेंगे। मित्रों वह महापुरुष कोई गृहस्थी भी हो सकता है, केवल जंगल में रहने से ही या कोई अच्छा सा नाम रख लेने से जैसे योग सम्राट श्री श्री महापुरुष जैसा नाम रख लेने मात्र से ही कोई संत नहीं बन जाता। इस प्रकार के नाम रखकर अपने को योग सम्राट और महाज्ञानी होने की घोषणा करने वाले सभी लोग ज्ञानी नहीं हो सकते उनमें से कुछ लोग ढोंगी भी हो सकते हैं। अभी कुछ समय पहले ही ऐसे कई ढोंगी दुराचार करते हुए पकड़े गए हैं और अब जेल की सलाखों के पीछे अपनी सही जगह पर पहुंच गए हैं। मित्रों हमें सच्चे संतों और महापुरुषों को पहचानने की दूर दृष्टि और सच्ची परख होनी चाहिए, तभी हम सच्चे गुरुओं को पहचान कर और फिर उनकी शरण में बैठकर ही आत्म ज्ञान को समझ पा सकते हैं। दोस्तों इस लेख में इतना ही, इसी ज्ञान यात्रा में हम आगे बढ़ते रहेंगे आपका दिन शुभ हो आप स्वस्थ रहें सदैव प्रसन्न रहें यही मेरी आप सभी के प्रति कामना है, धन्यवाद।

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