जीवन दर्शन और विज्ञान। तीसरा लेख।
मित्रों जीवन दर्शन और विज्ञान के इस ब्लॉग में आपका स्वागत है। दर्शन और विज्ञान दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं परंतु दर्शन का उदय हमेशा विज्ञान से पहले ही होता है। दर्शन यानी देखना जब हम कुछ भी देखते हैं तो हमारे मन में जिज्ञासाए शुरू हो जाती हैं की आखिर ऐसा होता क्यों है और सत्य क्या है यह जीवन क्या है और मुझे इनके बारे में विस्तार से जानना चाहिए असीम प्रकृति मनुष्य के चारों ओर विद्यमान है संपूर्ण प्रकृति में पांच तत्व माने गए हैं जल अग्नि पृथ्वी वायु और आकाश और दर्शन यह विचार भी करता है कि इन पांच तत्वों से भी पहले वह कौन सा एक तत्व है जिससे इन पांचों तत्वों का उदय होता है और जिसको हम परम सत्य या परमात्मा कहते हैं वह कौन सी प्रक्रिया है जिससे उस एक तत्व से इन पांच तत्वों का उदय होने लगता है। बहुत से विद्वानों ने इस पर गहन विचार किया है तथा अपने अपने विचार व्यक्त किए हैं। इसी दर्शन के सहारे मानव मन हमेशा से जीवन के अनेक गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने में लगा ही रहता है।जैसे कि इस मानव जन्म और जीवन का क्या कोई उद्देश्य है? इसका कारण क्या है? इस प्रकार से वह इन समस्त बातों के बारे में जानना चाहता है और वह हमेशा कोशिश में लगा ही रहता है।
यहीं से दर्शन का जन्म होना शुरू हो जाता है । वह यह भी सोचता है कि यह समाज क्या है और क्यों है यह समाज क्या किसी ने बनाया है क्या कोई इस प्रकार का नियंत्रण करने वाली परम शक्ति भी है जो इस विश्व को चलाती और इसका नियंत्रण रखती है। इस प्रकार से वह अत्यंत गूढ़ प्रश्नों के उत्तर को खोजने की कोशिश में हमेशा लगा ही रहता है और फिर जीवन की अनेक आवश्यकताएं भी जब सामने आने लगती हैं, जैसे खानपान की व्यवस्था रहन-सहन, पहनावा और फिर इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु वह विज्ञान से जुड़ जाता है और इस प्रकार फिर विज्ञान का जन्म हो जाता है और कृषि विज्ञान की गहन खोज के सहारे मनुष्य ने अनेक अत्याधुनिक यंत्रों का निर्माण कर मानव जीवन को अत्यंत सरल बना दिया है और अब विज्ञान इन सब सबसे आगे बढ़कर जीवन के मूल रहस्य को खोजने में लगा हुआ है की आखिर यह चेतना या यह चैतन्य तत्व क्या है? क्या यह अवचेतन है? या अति चेतन है? या परम चैतन्य है? इसका मूल रहस्य क्या है? क्या इसे किसी प्रकार जाना जा सकेगा? यह अत्यंत ही गूढ़ व विचारणीय बात है ।
विज्ञान सदैव ही समस्त प्रकार के परिवर्तनों के कारणों की खोज में लगा ही रहता है जैसे कि अपनी खोजों के द्वारा उसने जान लिया है कि जल का संगठन क्या है? वह किन मूल तत्वों से मिलकर बना हुआ है, और उसी प्रकार प्रत्येक वस्तु अनेक अणुओं और परमाणुओं से मिलकर बनी हुई है।इस प्रकार विज्ञान खोज में आगे बढ़ते बढ़ते 27 तत्वों की खोज कर चुका है अब इसके आगे की खोजों से यह सिद्ध होने लगा है कि परमाणु का भी विघटन करने पर सब के अंत में एक ही तत्व शक्ति के रूप में दिखाई पड़ता है। इस प्रकार विज्ञान के अनुसार भी समस्त पदार्थ एक ही तत्व से शुरू होते हैं, उसके बाद में परमाणुओं के अंदर थोड़े-थोड़े अंतर के हिसाब से अनेक तत्वों का जन्म हो जाता है। इस प्रकार से हम समझ पाते हैं कि दर्शन और विज्ञान परस्पर मिले हुए हैं। यह दोनों एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते। परंतु पहले दर्शन ही शुरू होता है। जैसे कि किसी भी चीज के बारे में देखना फिर उसके बारे में विचार शुरू करना यह दर्शन हुआ, और फिर उस एक विचार को ग्रहण कर उसकी खोजबीन में लग जाना और उसमें भी आगे बढ़कर उसका क्रमबद्ध तरीके से गहन अध्ययन और प्रयोगों को करना और उसके वास्तविक तथ्यों का पता लगाने की कोशिश करने को विज्ञान कहा जाता है ।
दर्शन यनि फिलॉसफी हमारी अंतर्ज्ञान शक्ति, हमारी भावनाएं, हमारी संवेदनाएं हमारा विवेक और हमारी विचार शक्ति कितनी गहराई तक जा सकती है, इस बात पर ही निर्भर करता है । बड़े-बड़े दार्शनिकों के विचारों में भी थोड़ा-थोड़ा अंतर अवश्य होता है। क्योंकि उनकी अपनी विचार करने की योग्यता में भी कुछ अंतर होता है और उन सब की अंतर्ज्ञान की शक्तियां भी कुछ अलग अलग होती हैं। एक वैज्ञानिक भी वस्तुतः पहले एक दार्शनिक ही होता है, फिर वह किसी एक विचार पर स्थिर होकर उसके ऊपर कार्य करने लगता है और इस प्रकार उसका फिर विज्ञान मैं प्रवेश हो जाता है। जैसे कि मशहूर दार्शनिक और वैज्ञानिक श्री आइज़क न्यूटन जब एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे और ऊपर से जब वहां एक फल गिरा उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि यह फल नीचे ही क्यों गिरा ऊपर क्यों नहीं गया? इसका क्या कारण है? सभी वस्तुएं ऊपर से नीचे ही क्यों गिरती हैं? इस प्रकार से यह एक दर्शन के विचार की शुरुआत हुई और फिर उन्होंने गहन खोज के बाद यह पाया कि यह सब पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण होता है। पृथ्वी सभी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है, इसी को उन्होंने गुरुत्वाकर्षण का नाम दिया और इस प्रकार वह गहन खोज करते हुए एक महान वैज्ञानिक कहलाए। इस प्रकार हम देखते हैं कि सर्वप्रथम हमारे विचार के रूप में दर्शन का ही जन्म होता है और उसके बाद हम खोज करते-करते विज्ञान के किसी एक नियम की खोज कर पाते हैं। जो बात दर्शन सदियों पहले कह चुका है कि वास्तव में तत्व एक ही है आधुनिक विज्ञान भी खोज करते करते अब यह कहने लगा है कि वास्तव में परम तत्व या भौतिक विज्ञान में भी अंतिम तत्व एक ही है । आधुनिक विज्ञान भी गहन खोज करते रहने पर यह जान पाया है कि सभी पदार्थ या सभी तत्व वास्तव में परमाणुओ से से बने होते हैं और प्रत्येक परमाणु की नाभिक के चारों ओर घूमने वाले इलेक्ट्रॉनो की संख्या और उसकी नाभिक में मौजूद प्रोटोंस की संख्या में कुछ अंतर होने के कारण सभी तत्व अलग अलग हो जाते हैं और जब उन परमाणुओ को भी तोड़ा गया तो उसके बाद उनका परिणाम केवल शक्ति के रूप में ही दिखाई पड़ता है। यनी अब विज्ञान भी धीरे-धीरे एक तत्व की मौजूदगी को स्वीकारने लगा है और जान चुका है कि वास्तव में तत्व एक ही है। असल में विज्ञान मानव जीवन मैं प्रकृति को ज्यादा से ज्यादा उपयोगी बनाने की खोज में ही लगा रहता है । इस प्रकार मनुष्य विज्ञान की सहायता से खोज करते हुए बैलगाड़ी से वायुयान और उससे भी तीव्र गति के अंतरिक्ष यान की सहायता से चांद पर और अन्य ग्रहों तक भी पहुंच चुका है और वहां पर भी जीवन की संभावनाओं का पता लगाने में व्यस्त है। मित्रों इस ज्ञान चर्चा को हम अपने आगे के लेखों में भी जारी रखेंगे। आपने इसे प्रेम से पढ़ा आपका दिन शुभ हो।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें