जीवन की ज्ञान यात्रा( प्रथम भाग)
ज्ञान वास्तव में क्या है? नित्य सवेरे उठना, स्नान करना फिर थोड़ा पूजा पाठ करना और फिर अपने गृहस्थ कार्य में लग जाना, कहीं नौकरी करते हैं तो ड्यूटी पर जाना या अपने प्राइवेट बिजनेस जैसे दुकान पर जाना, स्टूडेंट हैं तो पढ़ने जाना आदि। या फिर कोई तंत्र मंत्र की साधना करके, किसी देवता को प्रसन्न करके उसकी सिद्धि प्राप्त करना और उनसे कुछ शक्तियां हासिल करके इस दुनिया में गुरु महाराज या महापंडित कहलाना या सीधे सन्यास ले कर योग साधना में लग जाना, इनमें से हम सब के लिए क्या ठीक है? क्या गलत है? इस बात को गहराई से समझना बहुत जरूरी है। और इस अति महत्वपूर्ण विषय की जीवन ज्ञान यात्रा की चर्चा में यह पहली कड़ी है, इस चर्चा पर हम आगे के अनेक लेखों में गहराई से और विस्तार से वार्ता करते हुए इस चर्चा को और भी आगे बढ़ाते रहेंगे।
अपने स्वभाव के अनुसार चलना!..... दोस्तों इसके लिए हमें अपने स्वभाव को परखना और अपनी स्थिति को आंकना कि हम ज्ञान मार्ग के इस साधना पथ पर कौन से मुकाम पर खड़े हैं? हमारी यहां पर क्या स्थिति है? इस ज्ञान यात्रा में हम कितनी दूर तक पहुंचे हैं? या कि हम बिल्कुल शुरुआत ही कर रहे हैं, प्रयास अभी आरंभ ही किया है। मित्रों साधक के अनेक स्तर या अवस्थाएं होती हैं। सबसे पहले तो हम सभी को अपनी जीविकोपार्जन यनी धन प्राप्ति की स्थिति को सुदृढ़ करना होता है, क्योंकि जीवन में सभी चीजों की आवश्यकता होती है और यह आवश्यकता काफी हद तक धन के द्वारा पूर्ण होती है। लेकिन जब हम धन प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, तो कुछ लोग तो केवल धन प्राप्ति को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं! बस उन्हें धन में ही सब कुछ दिखाई देता है। उनसे यदि कोई धर्म ज्ञान की बात भी करता है तो वे कहते हैं, क्या ज्ञान-वान धन ही सब कुछ है। धन नहीं तो कुछ नहीं! कुछ लोग अपनी गृहस्थी बसा लेते हैं और फिर बीवी बच्चों और अपने मकान दुकान लेना देना आदि में व्यस्त हो जाते हैं, बस उनका ज्ञान केवल इतना ही होता है, कि बच्चे पालो मकान बनाओ! सुबह शाम दूध लाओ! थोड़ा बहुत घूमने जाओ, खुश रहो! धन जोड़ो! यही सब कुछ है, थोड़ा बहुत पूजा पाठ भी करना चाहिए ऐसी उनकी धारणा होती है। और इसी साधारण मार्ग पर चलती हुई वह अपनी जीवन यात्रा को पूर्ण कर लेते हैं यह एक साधारण मनुष्य की ज्ञान यात्रा है।
जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं… कुछ लोग थोड़ा और आगे बढ़ते हैं, वह पूजा-पाठ थोड़ा ज्यादा करते रहते हैं और इस चिंता में रहते हैं कि कोई शक्ति मिल जाए जिससे जीवन थोड़ा आसान हो जाए और मेरी पहचान भी एक विशेष मनुष्य की हो जाए। ऐसे लोग किसी तांत्रिक या थोड़ी बहुत सिद्धि प्राप्त मनुष्य के सानिध्य में रहकर कुछ सीख लेते हैं, और समाज सेवा के बहाने झाड़-फूंक जैसे कार्य करने लगते हैं, और थोड़ी बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कर लेते हैं और फिर आजीवन उसी मार्ग में रहकर अपना जीवन पूरा कर लेते हैं। जिस के अनेकों उदाहरण मिलते हैं। स्वामी योगानंद जी ने अपने ग्रंथ योगी कथामृत में एक व्यक्ति का जिक्र किया है जिसको एक महापुरुष संयोग से मिल गए थे और उन्होंने उससे कहा कि बेटा तुम इस मंत्र का इस विधि से जाप करोगे तो तुम्हें एक शक्ति प्राप्त होगी लेकिन उसका दुरुपयोग मत करना, लोगों की भलाई ही करना उसने लगन पूर्वक उस मंत्र का जाप किया, जिससे उसे ऐसी सिद्धि प्राप्त हो गई थी कि वह किसी अजमल नाम की शक्ति को पुकार कर उससे कोई भी कार्य करवा सकता था। उस शक्ति से वह सोने का निर्माण भी करवा सकता था, लेकिन वह वह सोना 1 घंटे तक बना रहता था उसके बाद गायब हो जाता था और वह ऐसा सोना बना कर सुनारो और बहुत से लोगों को ठगा करता था। वह अजमल नाम की उस शक्ति की सहायता से किसी के असली सोने को छूकर उसे गायब भी कर देता था और उसके जाने के बाद उसका उपयोग करता था। कुछ वर्षों बाद उसके गुरुदेव अपना एकांत वास छोड़कर दुनिया में भ्रमण करने आए तो उन्होंने देखा कि उनका शिष्य भोले भाले लोगों को ठग रहा है और समाज को नुकसान पहुंचा रहा है, उन्होंने उसकी परीक्षा ली जब उसकी धूर्तता देखी तो उसकी शक्ति को समाप्त कर दिया। उसके अत्यंत रोने गिड़गिड़ाने पर उससे कहा कि वह अब अपने पापों का प्रायश्चित करें और जंगल में जाकर तपस्या करें! जब भी उसे भोजन की आवश्यकता होगी! अजमल को पुकारने पर तुम्हें वह भोजन दे देगा। बस इतनी ही शक्ति अब तुम्हें दी जाती है! तुमसे फिर मिलेंगे और ऐसा कहकर वह अंतर्धान हो गए। इस प्रकार के अनेकों लोग इस दुनिया में हमें हर जगह मिलते हैं जो कि इस प्रकार की तांत्रिक विद्या को करते हैं। इनमें से कुछ लोग अच्छे भी होते हैं जो अपनी सिद्धि या अपनी शक्ति से लोगों का भला भी कर करते रहते हैं।
जब हम और आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं.. .कुछ लोग इस से थोड़ा आगे बढ़ते है ऐसे मनुष्य कुछ योग शक्ति या तांत्रिक शक्ति या कुछ थोड़ा बहुत योगाभ्यास आसन आदि में पारंगत होकर जीवन में अच्छे कार्यों में लगे रहते हैं किसी का भला हो जाए अपने देश का भला हो जाए, ऐसा उनका विचार रहता है केवल स्वर्ग प्राप्ति ही उनका मकसद होता है। कुछ लोग अपने किसी इष्ट देव या किसी भी देवता के पूजा पाठ में अत्यंत भक्ति भाव से लगे रहते हैं, जिससे उन्हें उनका थोड़ा बहुत सानिध्य प्राप्त हो जाता है और फिर अपने देवता की सहायता से वह लोगों की कुछ भलाइयां भी करते हैं। इस प्रकार इनमें से कुछ लोगों के हजारों अनुयाई हो जाते हैं इनकी काफी प्रसिद्धि भी हो जाती है और इनमें से इस प्रकार कुछ लोग पतित भी हो जाते हैं क्योंकि जब ज्यादा धन् और प्रसिद्धि हो जाती है तो कोई भी पतन के मार्ग पर भी जा सकता है।
महा साधकों का पथ!.... और मित्रों इससे आगे के साधक तो केवल ज्ञान प्राप्ति कोही अपना लक्ष्य बनाते हैं। ऐसे साधक या तो बचपन से ही पूर्ण विरक्त हो जाते हैं और किसी महान गुरु के उपदेश से तप साधना में लीन हो जाते हैं, और अपनी घोर साधना के बल पर अपने लक्ष्य पर पहुंच कर ही दम लेते हैं। इसका एक सुंदर उदाहरण श्री रमण महर्षि हैं। जैनियों के श्री महावीर स्वामी, बौद्ध धर्म के प्रवक्ता श्री बुद्ध देव जी, श्री रामकृष्ण परमहंस जी, सिद्ध पुरुष श्री बामाखेपा जी, आदिगुरु श्री शंकराचार्य जी आदि अनेकों उदाहरण हैं। इन्हें हम महान साधक कह सकते हैं।
महाज्ञानी साधक!..... और जब आगे विचार करते हैं हम देखते हैं कि कुछ सर्वगुण संपन्न साधक ऐसे भी है जो गृहस्थ जीवनमें निवास करते हैं लेकिन महाज्ञानी भी हैं। जिन्होंने अपनी पूर्व जन्म जन्म की तपस्या के प्रभाव से या अपने अथक प्रयास से यह योग सिद्धि की स्थिति प्राप्त की। जैसे महायोगी श्री श्याम चरण लाहिरी जी, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी, गंध बाबा स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती जी आदि अनेक महापुरुषों के उदाहरण हैं। श्री श्याम चरण लाहिरी जी एक महान योग साधक थे जो कि गृहस्थ जीवन में रहकर ही साधना के शिखर के निकट पहुंच गए थे। श्री तैलंग स्वामी जी काशी में श्मशान घाट के पास निवास करते थे, उन्होंने अपनी योग शक्ति के बल पर 300 वर्ष तक इस संसार में विचरण किया और बहुत सारे साधकों को सच्चा ज्ञान मार्ग बताया। उनकी योग शक्ति इतनी तीव्र थी कि वह जब एक बार गंगा जी में नहा रहे थे! उनके मन में आया कि मैं दूध पियूंगा! उनकी योग शक्ति के प्रभाव से गंगा जी का जल मिलो तक असली दूध के रूप में परिवर्तित हो गया था! और उनके दूध पीने के बाद वह फिर से जल में परिवर्तित हो गया था। श्री श्याम चरण लाहिरी जी उनकी योग प्रसिद्धि को सुनकर उनसे मिलने गए, तैलंग स्वामी हमेशा दिगंबर स्थिति में रहते थे, कोई भी वस्त्र नहीं पहनते थे। श्री श्याम चरण लाहिरी को देखते ही तैलंग स्वामी उठे और उन से गले मिले! यह देख कर उनकी कई अन्य शिष्य आश्चर्यचकित हो गए! स्वामी जी से पूछने लगे कि स्वामी जी इस व्यक्ति में ऐसा क्या है? जो आप इन्हें इतना मान दे रहे हैं और इनसे उठकर गले मिल रहे हैं! स्वामी जी मुस्कुराए और कहने लगे कि जिस स्थिति को प्राप्त करने के लिए मुझे अपने समस्त वस्त्र त्यागने पड़े हैं! उस स्थिति को इस साधक ने धोती कुर्ते में ही प्राप्त कर लिया है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस भी उनकी प्रसिद्धि को सुनकर उनके पास गए थे और उनकी स्थिति को देखकर उन्होंने कहा की साक्षात विश्वनाथ भगवान इनके शरीर का आश्रय ग्रहण कर प्रकट हो रहे हैं।
उपसंघार…
मित्रों जीवन में ज्ञान प्राप्ति के दो मुख्य मार्ग है पहला सांख्य योग मार्ग दूसरा निष्काम कर्म योग। सॉन्ग के मार्ग में संपूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे इस तक विचार को ध्यान पूर्वक समझना होता है क्योंकि वास्तव में संपूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों के द्वारा किए जाते हैं तो भी अज्ञानी जन ऐसा जानते हैं कि इनका करने वाला मैं ही हूं। निष्काम कर्म योग का आचरण करता हुआ गृहस्थ साधक अपने अंतःकरण को शुद्ध करके निरंतर आत्मा ध्यान में लीन रहकर इस जीवन ज्ञान साधना के पथ पर आगे बढ़ता हुआ महा सिद्धि को प्राप्त होता है और दिव्य ज्ञान को प्राप्त करता है। इस लेख में इतना ही। यह ज्ञान चर्चा आगे भी जारी रहेगी। आप सभी मित्रों का दिन शुभ हो! मंगलमय हो! लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद!








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