जीवन का सफर और उसकी ज्ञान यात्रा( पांचवा भाग)

 


हमारी दिनचर्या… सवेरा हो गया है! जीवन का सफर शुरू हो गया है! हम अपने नित्य प्रति के कार्यों में लग गए हैं! थोड़ी मॉर्निंग वॉक, स्नान, ध्यान आदि  होने के पश्चात अब नाश्ता कर रहे हैं, फिर नौकरी पर जाना है और शाम को घर आएंगे कुछ खा पी कर रात्रि में सो जाएंगे! फिर सवेरा और फिर वही शाम और रात्रि को आराम! ऐसा हम नित्य प्रति करते हैं क्योंकि यही तो हमारी दिनचर्या है! नित्य प्रति हम आराम करते हैं लेकिन क्या वास्तव में हमें आराम मिल पाता है? कुछ मिलता तो है! जब हम गहरी नींद में होते हैं! और जागकर हमें बहुत ताजगी महसूस होती है। सपनों की दुनिया में भी नित्य ही जाना होता है, जिससे सपने तो हम रोज ही देखते हैं, उसके बाद नींद में चले जाते हैं। सपनों की यह दुनिया,बस थोड़े समय के लिए ही होती है, अल्पकालिक! जैसी दुनिया  हम जागृत में देखते हैं, कुछ-कुछ वैसी ही होती है। कभी कोई सुखद सपना देख रहे होते हैं, और वह अचानक टूट जाए तो हम कहते हैं, अरे भाई कितना अच्छा सपना आ रहा था, टूट गया! थोड़ी देर और चलता तो बड़ा मजा आता और अच्छा लगता। रात के सपने की दुनिया, 60 मिनट, 100 मिनट, या 120 मिनट या कुछ कम ज्यादा भी होती है और दिन के जागते हुए सपने की दुनिया 50 वर्ष, 60 वर्ष, 100 वर्ष या यह भी कुछ कम ज्यादा हो सकती है! दोनों हैं एक जैसी! बस थोड़ा समय का फर्क है, वह रात्रि का सपना था! यह दिन का सपना है! 

             जीवन सपना या हकीकत… मित्रों हम जागते हुए भी सपने देखते रहते हैं! योजनाएं बनाते रहते हैं कि मुझे कल क्या करना है? कौन-सी तरक्की करनी है? कौन सी अच्छी चीज खरीदनी है? नया फ्रिज खरीदना है, कमरे में ऐसी भी लगवाना है, और अगले साल तो नई कार खरीद लूंगा! किस प्रकार से अपनी इनकम को  बढ़ा लूंगा? और बचत करूं! ताकि मैं अपनी सुख-सुविधा के सामानों को खरीद सकूं, जिससे कि मुझे शांति और आराम मिलेगा। मित्रों हम सभी हमेशा, आराम की खोज में ही रहते हैं कि किसी प्रकार ज्यादा सुख मिले या ज्यादा आराम हम कर सकें! इसी तलाश में हम सदैव रहते हैं। धीरे-धीरे हम सुख सुविधाओं  के सभी साधनों को एकत्रित  कर लेते हैं, उनमें से कुछ खराब हो जाते हैं तो  हम उन्हें फिर से खरीद लेते हैं, इसी प्रकार चलते-चलते, एक समय ऐसा भी आता है, जब हमें लगता है कि  अब तो यह शरीर कुछ थकने लगा है! अब ज्यादा काम नहीं होता, ज्यादा आराम करने की इच्छा होती है, लगता है, धीरे-धीरे बुढ़ापा आ रहा है! शरीर बूढ़ा होने लगा है,  इस बुढ़ापे का तो कोई  इलाज है नहीं! बस हम अपना खानपान जरा ज्यादा अच्छा करने लगते हैं! अच्छे-अच्छे फल और उनका जूस, चवनप्राश आदि  खाना शुरू करते हैं जिससे कि थोड़ी मजबूती बनी रहे और यह बुढ़ापा जरा देर से आए लेकिन यह रुकता नहीं और आता ही चला जाता है! इस बुढ़ापे का कोई इलाज भी नहीं है, यह तो बिन बुलाए मेहमान की भांति हमारे निकट आता ही चला जाता है और फिर हमारे भीतर ही समा जाता है।  बच्चे जब बड़े हो  जाते हैं तो हमें  समझाने लगते हैं।  पापा अब आप आराम किया करो, अब आपकी उम्र आराम करने की हो गई है।  हम सब संभाल लेंगे  और  हम भी  सोचने लगते हैं कि सचमुच अब तो बुढ़ापा आ ही गया है! दुनिया से जाने का और सब कुछ छोड़ने का समय नजदीक आ गया है! इतना कुछ किया, इतना सारा सामान इकट्ठा किया, इतना बड़ा राज्य के जैसा बनाया, पूरी गृहस्थी का साम्राज्य स्थापित किया, खुशियों के ऊंचे ऊंचे महल बनाए और जब तक जवानी में रहे, एक राजा की भांति  रहे! अब तो लगता है कि इतना कुछ किया लेकिन शायद कुछ भी ना किया! अपने आप को, अपनी चेतना को तो कभी  समझा ही नहीं, कभी ध्यान ही नहीं दिया कि मेरे अंतर में बोलने वाला,  समझने वाला,यह चैतन्य क्या है?  और अब तो जीवन की शाम शुरू हो गई है! धीरे-धीरे सब छुटने लगा है। प्रकृति का यही नियम है, जिसका निर्माण हुआ है उसका विनाश भी अवश्य होता है! एक जाता है, तो दूसरा आता है, सदैव कोई बना नहीं रहता! धीरे-धीरे सब कुछ छूट जाएगा और उसके बाद  मृत्यु की गोद में जाकर ही शायद आराम मिलेगा! लेकिन कुछ पता नहीं उसके बाद क्या होता है? इस बारे में तो हमने कभी चिंतन किया ही नहीं! और मरना तो हम बिल्कुल नहीं चाहते!  लेकिन मरना तो पड़ेगा ही, जिसका जन्म होता है, उसका मरण भी निश्चित है! इस बात को सभी जानते हैं। मित्रों हमने बहुत कोशिश की, कि आराम करें और आराम को प्राप्त करें, आराम तो बहुत किया लेकिन संपूर्णता से कभी  आराम  कर ही नहीं पाए! ना ही सच्चे आराम को ढूंढ पाए! आराम यनी  राम की पुकार! हे राम! आ जाओ, अब तो आ जाओ! अंत समय आ रहा है! मित्रों आराम के भीतर छिपे इस राम शब्द का वास्तव में क्या अर्थ है थोड़ा समझते हैं राम यनी कि जो सब में रमने वाला और मेरा भी जो चैतन्य  तत्व है,  वही तो राम है! जो तेरे मेरे और समस्त  प्राणी मात्र के भीतर संपूर्ण ब्रह्मांड और अनंत दूरी तक सर्वत्र व्याप्त है! उसी राम या आराम को ही तो  खोजना था! लेकिन हम तो इन सांसारिक  वस्तुओं को ही खोजने और इकट्ठा  करने में लगे रहे और कभी सच्चे आराम को  समझने की कोशिश नहीं की! और बाहर की इस दुनिया के रेत के महलों को ही खड़ा करने में लगे रहे और अब ये गिरने लगे हैं! तो अब क्या करें? मित्रों कोई बात नहीं जो हुआ, सो हुआ जो समय बीत गया, लौट कर कभी वापस तो नहीं आता! जब भी समझ आ जाए वहीं से शुरुआत कर देनी चाहिए। क्योंकि हम तो चैतन्य हैं! कोई जड़ तो नहीं! अपने आप को समझ सकते हैं! बदल सकते हैं! कहीं से भी शुरुआत करके अपना विकास कर सकते हैं! बस हमें अपनी सोच और अपने विचारों को अपने अंदर की ओर मोड़ना होगा! अपनी आत्मा और अपने चैतन्य को जानने के लिए  हमें जरा गहराई से समझना होगा कि कोई भी चीज जो हमें सुख दे रही है, अच्छी लग रही है, वह सुख कहीं  बाहर से नहीं आ रहा! मेरे भीतर से ही तो आ रहा है! यदि अंदर से सुख ना आए और बाहर  अमृत भी बरसता हो तो हमें कोई  सुख मिलेगा ही नहीं! क्योंकि यह सब कुछ अनुभव हमारी आत्मा से ही तो आता है! जब हम कोई चीज खाते हैं किसी को प्रेम करते हैं तो यह स्वाद और प्रेम का आनंद भी   हमारी आत्मा से ही आता है। अब जरा विचार करो करो यदि  हमारी तबीयत खराब है और उसी समय बाहर यदि कोई समारोह चल  रहा है, सुंदर संगीत बज रहा है तो हम उसका आनंद नहीं ले पाएंगे क्योंकि इस समय हम अपने इस बीमार भौतिक शरीर का ही तो अनुभव या ध्यान जो कर रहे हैं! अपनी आत्मा का नहीं! और क्योंकि हमने हमेशा इस संसार का ही  अभ्यास किया है और वही हम प्राप्त कर रहे हैं। और  इस अभ्यास के कारण ही, हम अपने  शरीर में और इस भौतिक संसार में जैसे परिवर्तन होते हैं, सुख के या दुख के, हम उन्हीं का अनुभव करते रहते हैं! सुख की परिस्थिति में सुख का और दुख की परिस्थिति में दुख का! और हमारा आत्मा तो वास्तव में सुख और दुख दोनों से ही परे है! यदि हमें अपने आत्मा की अनुभूति करनी है तो हमें अपने मन को सांसारिक वासनाओं से मोड़ कर अपने भीतर अपनी आत्मा ही में लगाना होगा, उसका निरंतर चिंतन करना होगा, गहन ध्यान करना होगा! जब तक के हमें आत्मानुभूति ना हो जाए! जब हमें अपनी आत्मा की अनुभूति होगी तो हम  सुख और दुख दोनों से ही परे आत्मा  के असीम आनंद का अनुभव करने लगेंगे। 



                   उपसंघार… मित्रों सच्चा सुख तो अपने अंदर से, हमारी अपनी आत्मा से ही आता है! पति और पत्नी का प्रेम, भाई बहन का प्रेम, माता-पिता, बच्चों का प्रेम, गुरु शिष्य का प्रेम, सभी कुछ, अपने अंदर से हमारी आत्मा से ही आता है!  इसलिए मित्रों, सच्चा ज्ञान और सच्चा सुख! हमारे अपने भीतर ही है! हमें उसे ही खोजना है! वही सच्चा आराम है! उसके लिए हमें संतों की वाणी को सुनना और समझना चाहिए। गीता में, उपनिषदों में, पुराणों में, वेदों में, और हमारे महान महापुरुषों ने सभी ने समझाया है कि सच्चा सुख हमें अपनी आत्मा से ही मिलता है! उसके लिए हमें अपनी आत्मा को समझना होगा, उसका निरंतर ध्यान करना होगा, हमें समझना होगा कि हम शरीर नहीं  हम एक परम चैतन्य आत्मा है! यदि हम इस ज्ञान को समझ ले तो फिर यह शरीर हमारे लिए एक वस्त्र के समान हो जाता है और हमें  बुढ़ापे या इस शरीर के रोगी होने से भी कोई फर्क नहीं  पड़ता और हम अपने आत्मा को जानकर अनंत रूप हो जाते हैं! मित्रों हमें इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए, आरंभ से ही और अभी से ही प्रयास करना होगा! तभी हम इसके बारे में ज्ञान पाएंगे और अपनी आत्मा को समझ पाएंगे। मित्रों इस लेख में इतना ही और यह चर्चा आगे भी जारी रहेगी। लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद आपका दिन शुभ हो।

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